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Samveda Mantra 1060

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ ययो꣢꣯स्त्रि꣣ꣳश꣢तं꣣ त꣡ना꣢ स꣣ह꣡स्रा꣢णि च꣣ द꣡द्म꣢हे । त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति ॥१०६०॥

आ꣢ । य꣡योः꣢꣯ । त्रि꣣ꣳश꣡त꣢म् । त꣡ना꣢꣯ । स꣣ह꣡स्रा꣢णि । च꣣ । द꣡द्म꣢꣯हे । त꣡र꣢꣯त् । सः । म꣣न्दी꣢ । धा꣣वति ॥१०६०॥

Mantra without Swara
आ ययोस्त्रिꣳशतं तना सहस्राणि च दद्महे । तरत्स मन्दी धावति ॥

आ । ययोः । त्रिꣳशतम् । तना । सहस्राणि । च । दद्महे । तरत् । सः । मन्दी । धावति ॥१०६०॥

Samveda - Mantra Number : 1060
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
(ययोः) दोषों का ध्वंस करनेवाले और बहुत से लाभों को देनेवाले जिन आत्मा और मन के (त्रिंशतम्) तीस (च) और (सहस्राणि) हजारों (तना) विस्तीर्ण ऐश्वर्य, हम (आदद्महे) ग्रहण कर लेते हैं, उन ऐश्वर्यों से (सः मन्दी) वह स्तोता (धावति) स्वयं को धो लेता है और (तरत्) शोक को तर जाता है, अर्थात् मुक्ति पा लेता है ॥ आत्मा और मन के तीस ऐश्वर्य इस प्रकार हैं—८ योगाङ्ग, २ अभ्यास-वैराग्य, १ प्रणवजप, १ वशीकार, १ अध्यात्मप्रसाद, ३ तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान, ४ वृत्तियाँ—मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा, ८ अणिमा आदि सिद्धियाँ, १ विवेकख्याति, १ कैवल्य। अनेक सहस्र ऐश्वर्य उन्हीं के महिमारूप हैं। आत्मा और मन को शुद्ध करके तथा उनका यथोचित उपयोग करके उपासक अगणित ऐश्वर्य प्राप्त कर सकता है, यह तात्पर्य है ॥४॥
Essence
केवल भौतिक धन ही धन नहीं है, प्रत्युत उसकी अपेक्षा अधिक महान् धन आध्यात्मिक धन है, जिसे पाने के लिए मनुष्यों को यत्न करना चाहिए ॥४॥
Subject
आगे पुनः आत्मा और मन का ही विषय वर्णित है।