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Samveda Mantra 1059

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ध्व꣣स्र꣡योः꣢ पुरु꣣ष꣢न्त्यो꣣रा꣢ स꣣ह꣡स्रा꣢णि दद्महे । त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति ॥१०५९॥

ध्व꣣स्र꣡योः꣢ । पु꣣रुष꣡न्त्योः꣢ । पु꣣रु । स꣡न्त्योः꣢꣯ । आ । स꣣ह꣡स्रा꣢णि । द꣣द्महे । त꣡र꣢꣯त् । सः । म꣣न्दी꣢ । धा꣣वति ॥१०५९॥

Mantra without Swara
ध्वस्रयोः पुरुषन्त्योरा सहस्राणि दद्महे । तरत्स मन्दी धावति ॥

ध्वस्रयोः । पुरुषन्त्योः । पुरु । सन्त्योः । आ । सहस्राणि । दद्महे । तरत् । सः । मन्दी । धावति ॥१०५९॥

Samveda - Mantra Number : 1059
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

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Meaning
ब्रह्मानन्दरूप सोम की धारा से नहाए हुए हम (ध्वस्रयोः) दोषों का ध्वंस करनेवाले, (पुरुषन्त्योः) बहुत से लाभों को देनेवाले आत्मा और मन के (सहस्राणि) हजारों ऐश्वर्यों को (आदद्महे) ग्रहण करते हैं, क्योंकि (मन्दी) परमेश्वर का स्तोता (सः) वह आनन्द-मग्न मनुष्य (धावति) स्वयं को धो लेता है और (तरत्) दुःख-जाल को तर लेता है ॥३॥
Essence
आत्मा और मन को उद्बोधन देकर लोग हजारों से भी अधिक लाभों को प्राप्त कर सकते हैं और अन्त में वे परमात्मा में मग्न होकर मोक्षपद पा लेते हैं ॥३॥ यहाँ सायणाचार्य ‘ध्वस्र’ और ‘पुरुषन्ति’ को किन्हीं विशेष राजाओं के नाम मानते हैं। तदनुसार उन्होंने इस मन्त्र का अर्थ करते हुए लिखा है कि ‘ध्वस्र कोई एक राजा था, पुरुषन्ति कोई दूसरा। उन दोनों राजाओं के सहस्रों धन हम ले लें। वह हमारे द्वारा लिया हुआ धन उत्तम हो। इस प्रकार ऋषि सोम से प्रार्थना कर रहा है।’ सायण का यह लिखना सङ्गत नहीं है, क्योंकि सृष्टि के आदि में प्रोक्त वेदों में परवर्ती इतिहास नहीं हो सकता ॥
Subject
अगले मन्त्र में ध्वस्र और पुरुषन्ति विशेषणों से आत्मा और मन के विषय में कहा गया है।

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