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Samveda Mantra 1057

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति꣣ धा꣡रा꣢ सु꣣त꣡स्यान्ध꣢꣯सः । त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति ॥१०५७॥

त꣡र꣢꣯त् । सः । म꣣न्दी꣢ । धा꣣वति । धा꣡रा꣢꣯ । सु꣣त꣡स्य꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । त꣡र꣢꣯त् । सः । म꣣न्दी꣢ । धा꣣वति ॥१०५७॥

Mantra without Swara
तरत्स मन्दी धावति धारा सुतस्यान्धसः । तरत्स मन्दी धावति ॥

तरत् । सः । मन्दी । धावति । धारा । सुतस्य । अन्धसः । तरत् । सः । मन्दी । धावति ॥१०५७॥

Samveda - Mantra Number : 1057
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

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Meaning
(सः) वह (मन्दी) स्तुतिकर्ता मनुष्य (सुतस्य) परमेश्वर के पास से परिस्रुत होकर आये हुए (अन्धसः) ब्रह्मानन्दरूप सोमरस की (धारा) धारा से (धावति) अन्तरात्मा को धो लेता है और (तरत्) दुःखसागर को तर जाता है। सचमुच, (मन्दी सः) मुदित हुआ वह (धावति) लक्ष्य के प्रति दौड़ लगाता है और (तरत्) ब्रह्मानन्द-सागर में तैरता रहता है ॥१॥ यहाँ प्रथम चरण की तृतीय चरण में आवृत्ति होने पर पादावृत्ति यमक अलङ्कार है ॥१॥
Essence
परमेश्वर के ध्यान में जो लोग मग्न हो जाते हैं, वे उसके पास से बहती हुई आनन्द की तरङ्गिणी से धोये जाकर निर्मलात्मा होते हुए त्रिविध दुःखों से छूटकर मुक्त हो जाते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५०० क्रमाङ्क पर ऐहिक एवं पारलौकिक उत्कर्ष के विषय में व्याख्यात हुई थी। यहाँ मोक्ष-प्राप्ति का विषय वर्णित किया जाता है।

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