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Samveda Mantra 1056

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
र꣣यिं꣡ न꣢श्चि꣣त्र꣢म꣣श्वि꣢न꣣मि꣡न्दो꣢ वि꣣श्वा꣢यु꣣मा꣡ भ꣢र । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०५६॥

र꣣यि꣢म् । नः꣣ । चित्र꣢म् । अ꣣श्वि꣡न꣢म् । इ꣡न्दो꣢꣯ । वि꣣श्वा꣡यु꣢म् । वि꣣श्व꣢ । आ꣣युम् । आ꣢ । भ꣣र । अ꣡थ꣢꣯ । नः꣣ । व꣡स्य꣢꣯सः । कृ꣣धि ॥१०५६॥

Mantra without Swara
रयिं नश्चित्रमश्विनमिन्दो विश्वायुमा भर । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

रयिम् । नः । चित्रम् । अश्विनम् । इन्दो । विश्वायुम् । विश्व । आयुम् । आ । भर । अथ । नः । वस्यसः । कृधि ॥१०५६॥

Samveda - Mantra Number : 1056
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्दो) चन्द्रमा के समान आह्लाददायक परमैश्वर्यशालिन् जगदीश्वर वा राजन् ! आप (नः) हमारे लिए (चित्रम्) अद्भुत, चित्र-विचित्र (अश्विनम्) शीघ्रगामी, (विश्वायुम्) पूर्ण आयु देनेवाला अथवा सब मनुष्यों का हित करनेवाला (रयिम्) धन (आ भर) प्राप्त कराओ। (अथ) इस प्रकार (नः) हमें (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) करो ॥१०॥
Essence
वही धन वास्तव में धन होता है, जिससे पूर्ण आयु और सब मनुष्यों का हित सिद्ध हो। जो विलास में लिप्त करके आयु को क्षय करनेवाला तथा दीनजनों से द्वेष करनेवाला धन होता है वह धन नहीं, किन्तु मौत होती है ॥१०॥
Subject
आगे पुनः परमात्मा और राजा का ही विषय कहा गया है।