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Samveda Mantra 1051

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्व꣡ꣳ सूर्ये꣢꣯ न꣣ आ꣡ भ꣢ज꣣ त꣢व꣣ क्र꣢त्वा꣣ त꣢वो꣣ति꣡भिः꣢ । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०५१॥

त्वम् । सू꣡र्ये꣢꣯ । नः꣣ । आ꣢ । भ꣣ज । त꣡व꣢꣯ । क्र꣡त्वा꣢꣯ । त꣡व꣢꣯ । ऊ꣣ति꣡भिः꣢ । अ꣡थ꣢꣯ । नः꣣ । व꣡स्य꣢꣯सः । कृ꣣धि ॥१०५१॥

Mantra without Swara
त्वꣳ सूर्ये न आ भज तव क्रत्वा तवोतिभिः । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

त्वम् । सूर्ये । नः । आ । भज । तव । क्रत्वा । तव । ऊतिभिः । अथ । नः । वस्यसः । कृधि ॥१०५१॥

Samveda - Mantra Number : 1051
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे सोम अर्थात् जगत्स्रष्टा परमात्मन् वा राष्ट्र के स्रष्टा राजन् ! (त्वम्) आप (तव क्रत्वा) अपने कर्म वा प्रकृष्ट ज्ञान से, (तव ऊतिभिः) और अपनी रक्षाओं से (सूर्ये) सूर्यलोक के समान प्रकाशमय एवं सब उन्नतियों से युक्त राष्ट्र में (नः) हमें (आ भज) भागी बनाओ। (अथ) और उसके अनन्तर (नः) हमें (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) करो ॥५॥
Essence
यदि परमात्मा की कृपा, राजा का उद्योग, और प्रजाजनों का पुरुषार्थ हो, तो राष्ट्र में सूर्य के समान उन्नति का प्रकाश सर्वत्र फैल जाए ॥५॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा और राजा से प्रार्थना की गयी है।