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Samveda Mantra 105

1875 Mantra
Devata- विश्वे देवाः Rishi- ऋजिश्वा भारद्वाजः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢प꣣ त्यं꣡ वृ꣢जि꣣न꣢ꣳ रि꣣पु꣢ꣳ स्ते꣣न꣡म꣢ग्ने दुरा꣣꣬ध्य꣢꣯म् । द꣡वि꣢ष्ठमस्य सत्पते कृ꣣धी꣢ सु꣣ग꣢म् ॥१०५॥

अ꣡प꣢꣯ । त्यम् । वृ꣣जिन꣢म् । रि꣣पु꣢म् । स्ते꣣न꣢म् । अ꣣ग्ने । दुराध्य꣢꣯म् । दुः꣣ । आ꣡ध्य꣢꣯म् । द꣡वि꣢꣯ष्ठम् । अ꣣स्य । सत्पते । सत् । पते । कृधि꣢ । सु꣣ग꣢म् । सु꣣ । ग꣢म् ॥१०५॥

Mantra without Swara
अप त्यं वृजिनꣳ रिपुꣳ स्तेनमग्ने दुराध्यम् । दविष्ठमस्य सत्पते कृधी सुगम् ॥

अप । त्यम् । वृजिनम् । रिपुम् । स्तेनम् । अग्ने । दुराध्यम् । दुः । आध्यम् । दविष्ठम् । अस्य । सत्पते । सत् । पते । कृधि । सुगम् । सु । गम् ॥१०५॥

Samveda - Mantra Number : 105
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सत्पते) सज्जनों के पालनकर्ता (अग्ने) पराक्रमशाली परमात्मन्, विद्वान् जन अथवा राजन् ! आप (त्यम्) उस (वृजिनम्) छोड़ने योग्य पाप को, (रिपुम्) कामक्रोधादि षड्रिपुवर्ग को, अथवा बाह्य शत्रु को, (स्तेनम्) चोर को, और (दुर्-आध्यम्) बुरा चिन्तन करनेवाले द्वेषी को (दविष्ठम्) दूर से दूर (अप अस्य) फेंक दीजिए ॥९॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥९॥
Essence
पाप विचार या पापीजन, काम-क्रोध आदि आन्तरिक रिपु या बाह्य शत्रु, चोरी के विचार या चोर लोग, दुश्चिन्ताएँ या दुश्चिन्तनकारी मनुष्य, जो भी हम पर आक्रमण करते हैं, उन्हें हम परमात्मा, विद्वान् लोगों और राजा की सहायता से दूर कर दें। सद्विचार और सद्विचारशील लोग सहयोगी बनकर हमारे साथ विचरें ॥९॥
Subject
अगले मन्त्र में रिपुओं को दूर करने की प्रार्थना की गयी है।