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Samveda Mantra 1049

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣢ना꣣ द꣡क्ष꣢मु꣣त꣢꣫ क्रतु꣣म꣡प꣢ सोम꣣ मृ꣡धो꣢ जहि । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०४९॥

स꣡न꣢꣯ । द꣡क्ष꣢꣯म् । उ꣣त꣢ । क्र꣡तु꣢꣯म् । अ꣡प꣢꣯ । सो꣣म । मृ꣡धः꣢꣯ । ज꣣हि । अ꣡थ꣢꣯ । नः꣣ । व꣡स्य꣢꣯सः । कृ꣣धि ॥१०४९॥

Mantra without Swara
सना दक्षमुत क्रतुमप सोम मृधो जहि । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

सन । दक्षम् । उत । क्रतुम् । अप । सोम । मृधः । जहि । अथ । नः । वस्यसः । कृधि ॥१०४९॥

Samveda - Mantra Number : 1049
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोम) ऐश्वर्य उत्पन्न करने में समर्थ जीवात्मन् ! तू (दक्षम्) बल को (उत) और (क्रतुम्) कर्म तथा प्रज्ञान को (सन) प्राप्त कर। (मृधः) संग्रामकारी हिंसक काम-क्रोध आदि आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं को (अप जहि) विनष्ट कर। (अथ) इस प्रकार अपना उत्कर्ष करने के अनन्तर (नः) हमें भी (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) कर ॥३॥
Essence
मनुष्य को चाहिए कि स्वयं बल, कर्म, प्रज्ञान, सारे ही ऐश्वर्य को सञ्चित करके तथा विघ्नकारियों को पराजित करके, सबका अगुआ बनकर दूसरों का भी उपकार करे ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर जीवात्मा का ही विषय है।