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Samveda Mantra 1047

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡ना꣢ च सोम꣣ जे꣡षि꣢ च꣣ प꣡व꣢मान꣣ म꣢हि꣣ श्र꣡वः꣢ । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०४७॥

स꣡न꣢꣯ । च꣣ । सोम । जे꣡षि꣢꣯ । च꣣ । प꣡व꣢꣯मान । म꣡हि꣢꣯ । श्र꣡वः꣢꣯ । अ꣡थ꣢꣯ । नः꣣ । व꣡स्य꣢꣯सः । ꣣कृधि ॥१०४७॥

Mantra without Swara
सना च सोम जेषि च पवमान महि श्रवः । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

सन । च । सोम । जेषि । च । पवमान । महि । श्रवः । अथ । नः । वस्यसः । कृधि ॥१०४७॥

Samveda - Mantra Number : 1047
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

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Meaning
हे (पवमान) गतिशील, कर्मशूर, पवित्रतादायक (सोम) ऐश्वर्यवान्, शुभगुणकर्मों के प्रेरक जीवात्मन् ! तू (महि श्रवः) महान् यश व महान् शास्त्रश्रवण को (सन) प्राप्त कर, (जेषि च) और संसार के समराङ्गण में विजयलाभ कर। (अथ) और उसके अनन्तर (नः) हमें भी (वस्यसः) अतिशय ऐश्वर्यवान् (कृधि) कर ॥१॥
Essence
जो स्वयं परमात्मा का उपासक, पुरुषार्थी, शास्त्र की मर्यादा को सीखा हुआ और विजयशील है, वही दूसरों को प्रशस्त गुण-कर्मोंवाला परमैश्वर्यशाली बना सकता है ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में सोम नाम से जीवात्मा को उद्बोधन है।

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