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Samveda Mantra 1045

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
गो꣣षा꣡ इ꣢न्दो नृ꣣षा꣡ अ꣢स्यश्व꣣सा꣡ वा꣢ज꣣सा꣢ उ꣣त꣢ । आ꣣त्मा꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ पू꣣र्व्यः꣢ ॥१०४५॥

गो꣣षाः꣢ । गो꣢ । साः꣢ । इ꣣न्दो । नृषाः꣢ । नृ꣣ । साः꣢ । अ꣣सि । अश्वसाः꣢ । अ꣣श्व । साः꣢ । वा꣣जसाः꣢ । वा꣣ज । साः꣢ । उ꣣त꣢ । आ꣣त्मा꣢ । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । पू꣣र्व्यः꣢ ॥१०४५॥

Mantra without Swara
गोषा इन्दो नृषा अस्यश्वसा वाजसा उत । आत्मा यज्ञस्य पूर्व्यः ॥

गोषाः । गो । साः । इन्दो । नृषाः । नृ । साः । असि । अश्वसाः । अश्व । साः । वाजसाः । वाज । साः । उत । आत्मा । यज्ञस्य । पूर्व्यः ॥१०४५॥

Samveda - Mantra Number : 1045
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्दो) तेजस्वी, आनन्द-रस से आर्द्र करनेवाले परमात्मदेव ! आप (गोषाः) गायों, वेदवाणियों, भूमियों वा इन्द्रियों को देनेवाले, (नृषाः) पुरुषार्थी वीर सन्तानों को देनेवाले, (अश्वसाः) घोड़ों और प्राणों को देनेवाले, (उत) और (वाजसाः) बल, अन्न, धन और विज्ञान को देनेवाले (असि) हो। आप (यज्ञस्य) परोपकार-रूप यज्ञ के (पूर्व्यः) सनातनकाल से चले आये (आत्मा) प्राण हो ॥९॥
Essence
अहो, महान् हैं जगदीश्वर के उपकार, जो हमें अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ उत्पन्न करके देता ह और ऐसा करता हुआ वह सबको परोपकार का उपदेश करता है ॥९॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा के गुण-कर्मों का वर्णन है।