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Samveda Mantra 1042

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡चि꣢क्रद꣣द्वृ꣢षा꣣ ह꣡रि꣢र्म꣣हा꣢न्मि꣣त्रो꣡ न द꣢꣯र्श꣣तः꣢ । स꣡ꣳ सूर्ये꣢꣯ण दिद्युते ॥१०४२॥

अ꣡चि꣢꣯क्रदत् । वृ꣡षा꣢꣯ । ह꣡रिः꣢꣯ । म꣣हा꣢न् । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । न । द꣣र्शतः꣢ । सम् । सू꣡र्ये꣢꣯ण । दि꣣द्युते ॥१०४२॥

Mantra without Swara
अचिक्रदद्वृषा हरिर्महान्मित्रो न दर्शतः । सꣳ सूर्येण दिद्युते ॥

अचिक्रदत् । वृषा । हरिः । महान् । मित्रः । मि । त्रः । न । दर्शतः । सम् । सूर्येण । दिद्युते ॥१०४२॥

Samveda - Mantra Number : 1042
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
परमेश्वर की ही यह महिमा है कि (हरिः) वायु से इधर-उधर ले जाया जाता हुआ, (वृषा) वर्षा करनेवाला बादल (अचिक्रदत्) स्वयं को गरजाता है। (महान्) विशाल वह बादल (मित्रः न) मित्र के समान (दर्शतः) दर्शनीय होता है और वह बादल (सूर्येण) सूर्य द्वारा (सं दिद्युते) भलीभाँति दीप्त होता है, बिजली की छटाओं से भासित होता है ॥६॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥६॥
Essence
बादल जब गरजता है, बिजली चमकाता है और बरसता है तब गरमी की धूप से तप्त लोग उसका मित्र के समान स्वागत करते हैं। बादल के जो उपकार हैं, वे वास्तव में परेश्वर के ही उपकार समझने चाहिएँ, क्योंकि वह उसी से सञ्चालित होता है ॥६॥
Subject
छठी ऋचा ४९७ क्रमाङ्क पर परमेश्वर के विषय में व्याख्यात की गयी थी। यहाँ बादल के वर्णन द्वारा परमात्मा की महिमा प्रकट की गयी है।