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Samveda Mantra 1035

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
शु꣣म्भ꣡मा꣢ना ऋता꣣यु꣡भि꣢र्मृ꣣ज्य꣡मा꣢ना꣣ ग꣡भ꣢स्त्योः । प꣡व꣢न्ते꣣ वा꣡रे꣢ अ꣣व्य꣡ये꣢ ॥१०३५॥

शु꣣म्भ꣡मा꣢नाः । ऋ꣣तायु꣡भिः꣢ । मृ꣣ज्य꣢मा꣢नाः । ग꣡भ꣢꣯स्त्योः । प꣡व꣢꣯न्ते । वा꣡रे꣢꣯ । अ꣣व्य꣡ये꣢ ॥१०३५॥

Mantra without Swara
शुम्भमाना ऋतायुभिर्मृज्यमाना गभस्त्योः । पवन्ते वारे अव्यये ॥

शुम्भमानाः । ऋतायुभिः । मृज्यमानाः । गभस्त्योः । पवन्ते । वारे । अव्यये ॥१०३५॥

Samveda - Mantra Number : 1035
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
(शुम्भमानाः) शोभित होते हुए, (ऋतायुभिः) अध्यात्म-यज्ञ के अभिलाषियों द्वारा (गभस्त्योः) मन, बुद्धि-रूप द्यावापृथिवियों में (मृज्यमानाः) अलङ्कृत किये जाते हुए ब्रह्मानन्द-रूप सोमरस (अव्यये) अविनाशी (वारे) दोषों के निवारक अन्तरात्मा में (पवन्ते) प्रवाहित हो रहे हैं ॥२॥
Essence
धर्ममेघ-समाधि में जब योगी के अन्तरात्मा में ब्रह्मानन्द के झरने झरते हैं, तब उसके मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदि सभी रस से सिंचे हुए के सदृश हो जाते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर ब्रह्मानन्द-रस के प्रवाह का वर्णन है।