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Samveda Mantra 1033

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्रय ऋषयः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ꣢ग्रे꣣ सि꣡न्धू꣢नां꣣ प꣡व꣢मानो अर्ष꣣त्य꣡ग्रे꣢ वा꣣चो꣡ अ꣢ग्रि꣣यो꣡ गोषु꣢꣯ गच्छसि । अ꣢ग्रे꣣ वा꣡ज꣢स्य भजसे म꣣ह꣡द्धन꣢꣯ꣳ स्वायु꣣धः꣢ सो꣣तृ꣡भिः꣢ सोम सूयसे ॥१०३३॥

अ꣡ग्रे꣢꣯ । सि꣡न्धू꣢꣯नाम् । प꣡व꣢꣯मानः । अ꣡र्षसि । अ꣡ग्रे꣢꣯ । वा꣣चः꣢ । अ꣡ग्रियः꣢ । गो꣡षु꣢꣯ । ग꣣च्छसि । अ꣡ग्रे꣢꣯ । वा꣡ज꣢꣯स्य । भ꣣जसे । मह꣢त् । ध꣡न꣢꣯म् । स्वा꣣यु꣢धः । सु꣡ । आयुधः꣢ । सो꣣तृ꣡भिः꣢ । सो꣣म । सूयसे ॥१०३३॥

Mantra without Swara
अग्रे सिन्धूनां पवमानो अर्षत्यग्रे वाचो अग्रियो गोषु गच्छसि । अग्रे वाजस्य भजसे महद्धनꣳ स्वायुधः सोतृभिः सोम सूयसे ॥

अग्रे । सिन्धूनाम् । पवमानः । अर्षसि । अग्रे । वाचः । अग्रियः । गोषु । गच्छसि । अग्रे । वाजस्य । भजसे । महत् । धनम् । स्वायुधः । सु । आयुधः । सोतृभिः । सोम । सूयसे ॥१०३३॥

Samveda - Mantra Number : 1033
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे सोम अर्थात् जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! (पवमानः) पवित्रकर्ता आप (सिन्धूनाम्) नदियों के (अग्रे) आगे-आगे (अर्षसि) चलते हो, अर्थात् उन्हें आप ही प्रवाहित करते हो। (वाचः) मनुष्यों से उच्चारण की जाती हुई वाणी के (अग्रे) आगे (गच्छसि) चलते हो, अर्थात् आपकी दी हुई वाक्शक्ति से ही मनुष्य व्यक्त वाणी का उच्चारण करते हैं। (अग्रियः) आगे स्थित आप (गोषु) सूर्य-किरणों में (गच्छसि) पहुँचते हो, अर्थात् सूर्य-किरणों को भी आप ही प्रकाशित एवं प्रेरित करते हो और (वाजस्य) अन्न तथा संग्राम के भी (अग्रे) आगे, आप ही जाते हो, अर्थात् अन्न आदि की उत्पत्ति और संग्राम में विजय भी आप ही कराते हो। आप (महत् धनम्) महान् ऐश्वर्य को (भजसे) प्राप्त किये हुए हो। हे (सोम) परमात्मन् ! (स्वायुधाः) उत्तम शस्त्रास्त्र जिसके पास हैं, ऐसे सेनापति के समान रक्षा करने में समर्थ आप (सोतृभिः) ध्यानयज्ञ करनेवाले उपासकों के द्वारा (सूयसे) अभिषुत किये जाते हो, अर्थात् वे आपसे अपने लिए आनन्द-रस को क्षरित करते हैं ॥३॥
Essence
बाहरी जगत् में और शरीर के अन्दर होनेवाली सारी व्यवस्था को सर्वान्तर्यामी परमेश्वर ही कराता है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर का कर्तृत्व वर्णित है।