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Samveda Mantra 103

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
ई꣡डि꣢ष्वा꣣ हि꣡ प्र꣢ती꣣व्याँ꣢३ य꣡ज꣢स्व जा꣣त꣡वे꣢दसम् । च꣣रिष्णु꣡धू꣢म꣣म꣡गृ꣢भीतशोचिषम् ॥१०३॥

ई꣡डि꣢꣯ष्व । हि । प्र꣣तीव्य꣢꣯म् । प्र꣣ति । व्य꣢꣯म् । य꣡ज꣢꣯स्व । जा꣣तवे꣡द꣢सम् । जा꣣त꣢ । वे꣣दसम् । चरिष्णु꣡धू꣢मम् । च꣣रिष्णु꣢ । धू꣣मम् । अ꣡गृ꣢꣯भीतशोचिषम् । अ꣡गृ꣢꣯भीत । शो꣣चिषम् ॥१०३॥

Mantra without Swara
ईडिष्वा हि प्रतीव्याँ३ यजस्व जातवेदसम् । चरिष्णुधूममगृभीतशोचिषम् ॥

ईडिष्व । हि । प्रतीव्यम् । प्रति । व्यम् । यजस्व । जातवेदसम् । जात । वेदसम् । चरिष्णुधूमम् । चरिष्णु । धूमम् । अगृभीतशोचिषम् । अगृभीत । शोचिषम् ॥१०३॥

Samveda - Mantra Number : 103
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्य ! तू (प्रतीव्यम्) प्रत्येक वस्तु में व्यापक, (चरिष्णुधूमम्) जिसका धुएँ के तुल्य शत्रु-प्रकम्पक प्रभाव संचरणशील है ऐसे, (अगृभीतशोचिषम्) अप्रतिरुद्ध तेजवाले (जातवेदसम्) सद्गुणरूप दिव्य धन को उत्पन्न करनेवाले परमात्माग्नि की, (ईडिष्व हि) अवश्य ही स्तुति कर और (यजस्व) उसकी पूजा कर ॥७॥ श्लेष से भौतिक अग्नि के पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए ॥७॥
Essence
जैसे धूमशिखाओं को उठानेवाले, चमकीली ज्वालाओंवाले भौतिक अग्नि का शिल्पीजन शिल्पयज्ञों में प्रयोग करते हैं, वैसे ही प्रतापरूप धूम से शोभित, दीप्त तेजोंवाले, सत्य-अहिंसा-अस्तेय आदि दिव्य धनों के जनक परमात्माग्नि की उत्कर्ष चाहनेवाले मनुष्यों को स्तुति और पूजा करनी चाहिए ॥७॥
Subject
अगले मन्त्र में भौतिक अग्नि के सादृश्य से परमात्मा का विषय वर्णित है।