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Samveda Mantra 1029

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ꣡ ति꣢ष्ठ वृत्रह꣣न्र꣡थं꣢ यु꣣क्ता꣢ ते꣣ ब्र꣡ह्म꣢णा꣣ ह꣡री꣢ । अ꣡र्वाची꣢न꣣ꣳ सु꣢ ते꣣ म꣢नो꣣ ग्रा꣡वा꣢ कृणोतु व꣣ग्नु꣡ना꣢ ॥१०२९॥

आ । ति꣣ष्ठ । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । र꣡थ꣢꣯म् । यु꣣क्ता꣢ । ते꣣ । ब्र꣡ह्म꣢꣯णा । हरी꣣इ꣡ति꣢ । अ꣣र्वाची꣡न꣢म् । अ꣣र्व । अची꣡न꣢म् । सु । ते꣣ । म꣡नः꣢꣯ । ग्रा꣡वा꣢꣯ । कृ꣣णोतु । वग्नु꣡ना꣢ ॥१०२९॥

Mantra without Swara
आ तिष्ठ वृत्रहन्रथं युक्ता ते ब्रह्मणा हरी । अर्वाचीनꣳ सु ते मनो ग्रावा कृणोतु वग्नुना ॥

आ । तिष्ठ । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । रथम् । युक्ता । ते । ब्रह्मणा । हरीइति । अर्वाचीनम् । अर्व । अचीनम् । सु । ते । मनः । ग्रावा । कृणोतु । वग्नुना ॥१०२९॥

Samveda - Mantra Number : 1029
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 7;

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Meaning
हे (वृत्रहन्) पाप, विघ्न आदि के विनाशक जीवात्मन् ! तू (रथम्) नवीन शरीर-रूप रथ पर (आ तिष्ठ) आकर बैठ। (ब्रह्मणा) मुझ परमेश्वर ने (ते) तेरे लिए (हरी) प्राण-अपान वा ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय (युक्ता) तुझमें नियुक्त किये हैं। कुमारावस्था में गुरुकुल में प्रविष्ट होने के पश्चात् (ग्रावा) विद्वान् उपदेष्टा गुरु (वग्नुना) उपदेश-रूप शब्द से (ते मनः) तेरे मन को (अर्वाचीनम्) धर्म के अभिमुख (सु कृणोतु) भली-भाँति करे ॥२॥
Essence
जीवात्मा माता के गर्भ में प्रवेश करके जन्म लेकर माता और पिता जी की गोद में खेलता हुआ उनके सान्निध्य से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त कर कुमार अवस्था में यथोचित समय पर गुरुकुल में जाकर गुरुओं से शास्त्राध्ययन करता हुआ मन को धर्म में लगाए ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में यह कहा है कि परमेश्वर जीवात्मा को नये जन्म में देह में प्रवेश कराता है।

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