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Samveda Mantra 1028

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ꣡सा꣢वि꣣ सो꣡म꣢ इन्द्र ते꣣ श꣡वि꣢ष्ठ धृष्ण꣣वा꣡ ग꣢हि । आ꣡ त्वा꣢ पृणक्त्विन्द्रि꣣य꣢꣫ꣳ रजः꣣ सू꣢र्यो꣣ न꣢ र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥१०२८॥

अ꣡सा꣢꣯वि । सो꣡मः꣢꣯ । इ꣣न्द्र । ते । श꣡वि꣢꣯ष्ठ । धृ꣣ष्णो । आ꣢ । ग꣣हि । आ꣢ । त्वा꣣ । पृणक्तु । इन्द्रिय꣢म् । र꣡जः꣢꣯ । सू꣡र्यः꣢꣯ । न । र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥१०२८॥

Mantra without Swara
असावि सोम इन्द्र ते शविष्ठ धृष्णवा गहि । आ त्वा पृणक्त्विन्द्रियꣳ रजः सूर्यो न रश्मिभिः ॥

असावि । सोमः । इन्द्र । ते । शविष्ठ । धृष्णो । आ । गहि । आ । त्वा । पृणक्तु । इन्द्रियम् । रजः । सूर्यः । न । रश्मिभिः ॥१०२८॥

Samveda - Mantra Number : 1028
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 7;

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Meaning
हे (इन्द्र) सखा जीवात्मा ! मैंने (ते) तेरे लिए (सोमः) आनन्दरस (असावि) उत्पन्न किया है। (हे शविष्ठ) बलिष्ठ ! हे (धृष्णो) कामादि शत्रुओं के पराजेता ! (आगहि) आ। (इन्द्रियम्) आत्मबल (त्वा) तुझे (आ पृणक्तु) परिपूर्ण करे, (सूर्यः न) जैसे सूर्य (रश्मिभिः) किरणों से (रजः) पृथिवी, चन्द्रमा आदि लोकों को परिपूर्ण करता है ॥१॥ यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
परमात्मा के साथ मैत्री करके जीवात्मा अविच्छिन्न आनन्द–रस की धारा को और अनन्त आत्मबल को पा लेता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ३४७ पर जीवात्मा और सेनाध्यक्ष के विषय में व्याख्या हो चुकी है। यहाँ परमात्मा जीवात्मा को कह रहा है।