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Samveda Mantra 1020

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मन्युर्वासिष्ठः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ꣢ध꣣ धा꣡र꣢या꣣ म꣡ध्वा꣢ पृचा꣣न꣢स्ति꣣रो꣡ रोम꣢꣯ पवते꣣ अ꣡द्रि꣢दुग्धः । इ꣢न्दु꣣रि꣡न्द्र꣢स्य स꣣ख्यं꣡ जु꣢षा꣣णो꣢ दे꣣वो꣢ दे꣣व꣡स्य꣢ मत्स꣣रो꣡ मदा꣢꣯य ॥१०२०॥

अ꣡ध꣢꣯ । धा꣡र꣢꣯या । म꣡ध्वा꣢꣯ । पृ꣣चानः꣢ । ति꣣रः꣢ । रो꣣म꣢꣯ । प꣣वते । अ꣡द्रि꣢꣯दुग्धः । अ꣡द्रि꣢꣯ । दु꣣ग्धः । इ꣡न्दुः꣢꣯ । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । स꣣ख्य꣢म् । स꣣ । ख्य꣢म् । जु꣣षाणः꣢ । दे꣢वः꣢ । दे꣣व꣡स्य꣢ । म꣣त्सरः꣢ । म꣡दाय꣢꣯ ॥१०२०॥

Mantra without Swara
अध धारया मध्वा पृचानस्तिरो रोम पवते अद्रिदुग्धः । इन्दुरिन्द्रस्य सख्यं जुषाणो देवो देवस्य मत्सरो मदाय ॥

अध । धारया । मध्वा । पृचानः । तिरः । रोम । पवते । अद्रिदुग्धः । अद्रि । दुग्धः । इन्दुः । इन्द्रस्य । सख्यम् । स । ख्यम् । जुषाणः । देवः । देवस्य । मत्सरः । मदाय ॥१०२०॥

Samveda - Mantra Number : 1020
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 6;

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Meaning
(अध) और, (अद्रिदुग्धः) मन-बुद्धि रूप सिलबट्टों से अभिषुत वह ब्रह्मानन्द-रूप सोम (मध्वा धारया) मधुर धारा से (पृचानः) संपृक्त करता हुआ (तिरः रोम) रोमाञ्च उत्पन्न करता हुआ (पवते) प्रवाहित होता है। (देवः) प्रकाश का दाता, (मत्सरः) मद-जनक (इन्दुः) सराबोर करनेवाला वह ब्रह्मानन्दरस (देवस्य) दिव्यगुणयुक्त (इन्द्रस्य) जीवात्मा की (सख्यम्) मैत्री को (जुषाणः) सेवन करता हुआ, उसके (मदाय) उत्साह के लिए होता है ॥२॥ यहाँ ध-र-द-म आदियों की अनेक बार आवृत्ति होने से वृत्त्यनुप्रास है। ‘देवो, देव’ में छेकानुप्रास है ॥२॥
Essence
ब्रह्म के पास से बही हुई आनन्दधाराएँ जब जीवात्मा को नहला देती हैं, तब अत्यन्त निर्मल अन्तःकरणवाला जीवन्मुक्त वह बड़े से बड़े दुःख को भी तिनके के बराबर भी नहीं समझता ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर ब्रह्मानन्दरस का वर्णन है।

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