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Samveda Mantra 1011

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऊर्ध्वसद्मा आङ्गिरसः Chhand- काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣢ द्यु꣣म्नं꣡ बृ꣣ह꣢꣫द्यश꣣ इ꣡ष꣢स्पते दीदि꣣हि꣡ दे꣢व देव꣣यु꣢म् । वि꣡ कोशं꣢꣯ मध्य꣣मं꣡ यु꣢व ॥१०११॥

अ꣣भि꣢ । द्यु꣣म्न꣢म् । बृ꣣ह꣢त् । य꣡शः꣢꣯ । इ꣡षः꣢꣯ । प꣣ते । दिदीहि꣢ । दे꣣व । देवयु꣢म् । वि । को꣡श꣢꣯म् । म꣣ध्यम꣡म् । यु꣣व ॥१०११॥

Mantra without Swara
अभि द्युम्नं बृहद्यश इषस्पते दीदिहि देव देवयुम् । वि कोशं मध्यमं युव ॥

अभि । द्युम्नम् । बृहत् । यशः । इषः । पते । दिदीहि । देव । देवयुम् । वि । कोशम् । मध्यमम् । युव ॥१०११॥

Samveda - Mantra Number : 1011
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 6;

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Meaning
हे (इषः पते) विज्ञान के स्वामी योगिप्रवर आचार्य ! आप (द्युम्नम्) अध्यात्म तेज, (बृहद् यशः) विशाल कीर्ति, हम शिष्यों को (अभि) प्राप्त कराइये। हे (देव) योगविद्या से प्रकाशित विद्वन् ! आप (देवयुम्) परमात्मदेव के इच्छुक मुझको (दिदीहि) परमात्मा का दर्शन कराकर प्रकाशित कर दीजिए। (मध्यमं कोशम्) पञ्च कोशों में से बीच में स्थित मेरे मनोमय कोश को (वि युव) उद्घाटित कर दीजिए, जिससे मैं विज्ञानमय और आनन्दमय कोश में आरोहण कर सकूँ ॥१॥
Essence
योगविद्या में निष्णात आचार्य के अनुशासन में स्थित शिष्य सारी अध्यात्म-विद्या पाकर परमात्मा के साक्षात्कार में समर्थ हो जाता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५७९ क्रमाङ्क पर परमात्मा को सम्बोधन की गयी थी। यहाँ योगिराज आचार्य को सम्बोधन है

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