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Samveda Mantra 1009

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
शु꣣भ्र꣡मन्धो꣢꣯ दे꣣व꣡वा꣢तम꣣प्सु꣢ धौ꣣तं꣡ नृभिः꣢꣯ सु꣣त꣢म् । स्व꣡द꣢न्ति꣣ गा꣢वः꣣ प꣡यो꣢भिः ॥१००९॥

शु꣣भ्र꣢म् । अ꣡न्धः꣢꣯ । दे꣣व꣡वा꣢तम् । दे꣣व꣢ । वा꣣तम् । अप्सु꣢ । धौ꣣त꣢म् । नृ꣡भिः꣢꣯ । सु꣣त꣢म् । स्व꣡द꣢꣯न्ति । गा꣡वः꣢꣯ । प꣡यो꣢꣯भिः ॥१००९॥

Mantra without Swara
शुभ्रमन्धो देववातमप्सु धौतं नृभिः सुतम् । स्वदन्ति गावः पयोभिः ॥

शुभ्रम् । अन्धः । देववातम् । देव । वातम् । अप्सु । धौतम् । नृभिः । सुतम् । स्वदन्ति । गावः । पयोभिः ॥१००९॥

Samveda - Mantra Number : 1009
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 6;

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Meaning
प्रथम—सोम ओषधि के रस के विषय में। (देववातम्) सूर्य या मेघ द्वारा बढ़ाये हुए (अप्सु) जलों से (धौतम्) धोये हुए, (नृभिः) ऋत्विज् मनुष्यों से (सुतम्) अभिषुत किये गये (शुभ्रम् अन्धः) स्वच्छ सोमरस को (गावः) गौएँ (पयोभिः) अपने दूधों से (स्वदन्ति) स्वादु बनाती हैं ॥ द्वितीय—ज्ञानरस के विषय में। (देववातम्) विद्वान् आचार्य से प्रेरित, (अप्सु) कर्मों में, आचरणों में (धौतम्) पहुँचाये हुए, (नृभिः) अन्य मार्गदर्शक गुरुजनों से (सुतम्) उत्पन्न किये गये (शुभ्रम् अन्धः) स्वच्छ ज्ञानरस को (गावः) वेदवाणियाँ (पयोभिः) ओङ्काररूप दूध से (स्वदन्ति) मधुर कर देती हैं ॥२॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥२॥
Essence
भौतिक ज्ञान अध्यात्म ज्ञान से मिलकर महान् कल्याण करनेवाला हो जाता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः वही विषय है।

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