Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 1003

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ꣢सि꣣ हि꣡ वी꣢र꣣ से꣢꣫न्योऽसि꣣ भू꣡रि꣢ पराद꣣दिः꣢ । अ꣡सि꣢ द꣣भ्र꣡स्य꣢ चिद्वृ꣣धो꣡ यज꣢꣯मानाय शिक्षसि सुन्व꣣ते꣡ भूरि꣢꣯ ते꣣ व꣡सु꣢ ॥१००३॥

अ꣡सि꣢꣯ । हि । वी꣣र । से꣡न्यः꣢꣯ । अ꣡सि꣢꣯ । भू꣡रि꣢꣯ । प꣣राददिः꣢ । प꣣रा । ददिः꣢ । अ꣡सि꣢꣯ । द꣣भ्र꣡स्य꣢ । चि꣣त् । वृधः꣢ । य꣡ज꣢꣯मानाय । शि꣣क्षसि । सुन्वते꣢ । भू꣡रि꣢꣯ । ते । व꣡सु꣢꣯ ॥१००३॥

Mantra without Swara
असि हि वीर सेन्योऽसि भूरि पराददिः । असि दभ्रस्य चिद्वृधो यजमानाय शिक्षसि सुन्वते भूरि ते वसु ॥

असि । हि । वीर । सेन्यः । असि । भूरि । पराददिः । परा । ददिः । असि । दभ्रस्य । चित् । वृधः । यजमानाय । शिक्षसि । सुन्वते । भूरि । ते । वसु ॥१००३॥

Samveda - Mantra Number : 1003
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे (वीर) पराक्रमशील मन ! तू (सेन्यः) सेनाओं में निपुण अर्थात् सेनापति (असि) है और (भूरि) भूरि-भूरि (पराददिः) शत्रुओं को दूर फेंकनेवाला (असि) है। साथ ही (दभ्रस्य चित्) क्षुद्र का भी (वृधः) बढ़ानेवाला (असि) है। तू (यजमानाय) यजनशील, परोपकारी मनुष्य के लिए (शिक्षसि) बल प्रदान करता है। (सुन्वते) वीररस उत्पन्न करनेवाले मनुष्य को (ते) तेरा (भूरि) बहुत अधिक (वसु) ऐश्वर्य प्राप्त होता है ॥२॥
Essence
जब मनुष्य अपने मन को सेनापति पद पर अभिषिक्त करके आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को जीतने का यत्न करते हैं, तब विजय निश्चित मिलती है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः मन को प्रबोधित किया गया है।

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.