Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 1002

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ꣢न्द्रो꣣ म꣡दा꣢य वावृधे꣣ श꣡व꣢से वृत्र꣣हा꣡ नृ꣢꣯भिः । त꣢꣫मिन्म꣣ह꣢त्स्वा꣣जि꣢षू꣣ति꣡मर्भे꣢꣯ हवामहे꣣ स꣡ वाजे꣢꣯षु꣣ प्र꣡ नो꣡ऽविषत् ॥१००२॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । म꣡दा꣢꣯य । वा꣣वृधे । श꣡व꣢꣯से । वृ꣣त्रहा꣢ । वृ꣡त्र । हा꣡ । नृ꣡भिः꣢꣯ । तम् । इत् । म꣣ह꣡त्सु꣢ । आ꣣जि꣡षु꣢ । ऊ꣣ति꣢म् । अ꣡र्भे꣢꣯ । ह꣣वामहे । सः꣢ । वा꣡जे꣢꣯षु । प्र । नः꣣ । अविषत् ॥१००२॥

Mantra without Swara
इन्द्रो मदाय वावृधे शवसे वृत्रहा नृभिः । तमिन्महत्स्वाजिषूतिमर्भे हवामहे स वाजेषु प्र नोऽविषत् ॥

इन्द्रः । मदाय । वावृधे । शवसे । वृत्रहा । वृत्र । हा । नृभिः । तम् । इत् । महत्सु । आजिषु । ऊतिम् । अर्भे । हवामहे । सः । वाजेषु । प्र । नः । अविषत् ॥१००२॥

Samveda - Mantra Number : 1002
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(वृत्रहा) पाप-नाशक (इन्द्रः) वीर मन (नृभिः) विजय की आकाङ्क्षावाले मनुष्यों द्वारा (मदाय) हर्ष के लिए और (शवसे) बल के लिए (वावृधे) बढ़ाया अर्थात् उत्साहित किया जाता है। (ऊतिम्) रक्षक (तम् इत्) उस मन को ही, हम (महत्सु) बड़े (आजिषु) आन्तरिक और बाह्य संग्रामों में तथा (अल्पे) छोटे संग्राम में (हवामहे) पुकारते हैं। (सः) वह मन (वाजेषु) उन युद्धों में (नः) हमारी (अविषत्) रक्षा करे ॥१॥
Essence
मनुष्य का मन यदि मर गया तो वह जीवन में कोई भी उन्नति नहीं कर सकता और मन यदि उत्साह से भर गया तो सब विघ्नों को और शत्रुओं को तिरस्कृत करता हुआ वह सब जगह विजय प्राप्त करता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ४११ क्रमाङ्क पर परमात्मा, जीवात्मा, राजा और सेनापति के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ मन रूप सेनापति को प्रबोधन दिया गया है।