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Samveda Mantra 1001

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यु꣣व꣡ꣳ हि स्थः स्वः꣢꣯पती꣣ इ꣡न्द्र꣢श्च सोम꣣ गो꣡प꣢ती । ई꣣शाना꣡ पि꣢प्यतं꣣ धि꣡यः꣢ ॥१००१॥

युव꣢म् । हि । स्थः । स्व꣢पती । स्वाऽ३रि꣡ति꣢ । प꣣तीइ꣡ति꣢ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । च꣣ । सोम । गो꣡प꣢꣯ती । गो । प꣣तीइ꣡ति꣢ । ई꣣शा꣢ना । पि꣣प्यतम् । धि꣡यः꣢꣯ ॥१००१॥

Mantra without Swara
युवꣳ हि स्थः स्वःपती इन्द्रश्च सोम गोपती । ईशाना पिप्यतं धियः ॥

युवम् । हि । स्थः । स्वपती । स्वाऽ३रिति । पतीइति । इन्द्रः । च । सोम । गोपती । गो । पतीइति । ईशाना । पिप्यतम् । धियः ॥१००१॥

Samveda - Mantra Number : 1001
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

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Meaning
हे (सोम) जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! आप (इन्द्रः च) और अज्ञान को दूर करनेवाले आचार्य (युवं हि) तुम दोनों ही (स्वःपती) ज्ञानप्रकाश के स्वामी और (गोपती) वाणी के अधिपति (स्थः) हो। (ईशाना) ज्ञान और वाणी के स्वामी आप दोनों हमारी (धियः) श्रेष्ठ प्रज्ञाओं और श्रेष्ठ क्रियाओं को (पिप्यतम्) बढ़ाओ ॥३॥
Essence
परमात्मा की उपासना से और गुरु के सत्कार से श्रेष्ठ सत्यज्ञान को प्राप्त करके मनुष्य अपने जीवन को उन्नत कर सकते हैं ॥३॥ इस खण्ड में परमात्मा, ब्रह्मानन्द-रस, आचार्य एवं प्रसङ्गतः गौओं तथा गोदुग्ध का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ षष्ठ अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में सोम नाम से परमेश्वर तथा इन्द्र नाम से आचार्य को कहा जा रहा है।

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