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Samveda Mantra 1000

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वृ꣡षा꣢ पुना꣣न꣡ आयू꣢꣯ꣳषि स्त꣣न꣢य꣣न्न꣡धि꣢ ब꣣र्हि꣡षि꣢ । ह꣢रिः꣣ स꣢꣫न्योनि꣣मा꣡स꣢दः ॥१०००॥

वृ꣡षा꣢꣯ । पु꣣नानः꣢ । आ꣡यू꣢꣯ꣳषि । स्त꣣न꣡य꣢न् । अ꣡धि꣢꣯ । ब꣣र्हि꣡षि꣢ । ह꣡रिः꣢꣯ । सन् । यो꣡नि꣢꣯म् । आ । अ꣣सदः ॥१०००॥

Mantra without Swara
वृषा पुनान आयूꣳषि स्तनयन्नधि बर्हिषि । हरिः सन्योनिमासदः ॥

वृषा । पुनानः । आयूꣳषि । स्तनयन् । अधि । बर्हिषि । हरिः । सन् । योनिम् । आ । असदः ॥१०००॥

Samveda - Mantra Number : 1000
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

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1 Bhashyas
Meaning
हे परमात्मन् वा आचार्य ! (वृषा) आनन्द, विद्या आदि की वर्षा करनेवाले आप (आयूंषि) हमारे जीवनों को (पुनानः) पवित्र करते हुए (बर्हिषि अधि) अध्यात्मयज्ञ वा विद्यायज्ञ में (स्तनयन्) उपदेश करते हुए (हरिः सन्) पाप, दुर्व्यसन, दुःख आदि को हरनेवाले होते हुए (योनिम्) आत्मारूप सदन में वा गुरुकुल-सदन में (आ असदः) विराजमान होते हो ॥२॥
Essence
परमात्मा हमारे हृदय में स्थित होकर अपनी प्रेरणा द्वारा और गुरु गुरुकुल में स्थित होकर सब विद्याओं के पढ़ाने तथा चरित्रनिर्माण के द्वारा हमारा उपकार करते हैं, इसलिए उनका पूजन और सत्कार सबको करना चाहिए ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर परमात्मा और आचार्य का विषय है।