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Rigveda Mandal 7 / Sukta 9 / Mantra 6

104 Sukta
6 Mantra
7/9/6
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- स्वराट्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वाम॑ग्ने समिधा॒नो वसि॑ष्ठो॒ जरू॑थं ह॒न्यक्षि॑ रा॒ये पुरं॑धिम्। पु॒रु॒णी॒था जा॑तवेदो जरस्व यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥६॥

त्वाम् । अ॒ग्ने॒ । स॒म्ऽइ॒धा॒नः । वसि॑ष्ठः । जरू॑थम् । ह॒न् । यक्षि॑ । रा॒ये । पुर॑म्ऽधिम् । पु॒रु॒ऽनी॒था । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । ज॒र॒स्व॒ । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
त्वामग्ने समिधानो वसिष्ठो जरूथं हन्यक्षि राये पुरंधिम्। पुरुणीथा जातवेदो जरस्व यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

त्वाम्। अग्ने। सम्ऽइधानः। वसिष्ठः। जरूथम्। हन्। यक्षि। राये। पुरम्ऽधिम्। पुरुऽनीथा। जातऽवेदः। जरस्व। यूयम्। पात। स्वस्तिऽभिः। सदा। नः ॥६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 12 Mantra » 6

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Meaning
हे (जातवेदः) विज्ञान को प्राप्त (अग्ने) अग्नि के तुल्य विद्यादि गुणों से प्रकाशित विद्वन् ! जैसे (समिधानः) सम्यक् प्रकाशमान (वसिष्ठः) अत्यन्त धनी (जरूथम्) शिथिलावस्था से युक्त जीर्ण मेघ को (हन्) हनन करता है, वैसे सुन्दर सभा के योग्य (पुरन्धिम्) बहुतों को धारण करनेवाले (त्वाम्) आप विद्वान् का (राये) धन प्राप्ति के लिये मैं (यक्षि) सङ्ग करता हूँ (यूयम्) तुम लोग (स्वस्तिभिः) सुख साधनों से (नः) हमारी (सदा) सदा (पात) रक्षा करो और (पुरुनीथा) बहुतों को प्राप्त होनेवाले धर्मयुक्त कर्मों की (जरस्व) प्रशंसा करो ॥६॥
Essence
जो राजा के सहित सम्य लोग, सूर्य मेघ को जैसे, वैसे अविद्या और दुष्टाचारों का नाश करते हैं, सब को धर्मयुक्त मार्ग को प्राप्त कराते, वे सब के यथावत् रक्षक होते हैं ॥६॥ इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह नववाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर वे विद्वान् क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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