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Rigveda Mandal 7 / Sukta 9 / Mantra 4

104 Sukta
6 Mantra
7/9/4
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ई॒ळेन्यो॑ वो॒ मनु॑षो यु॒गेषु॑ समन॒गा अ॑शुचज्जा॒तवे॑दाः। सु॒सं॒दृशा॑ भा॒नुना॒ यो वि॒भाति॒ प्रति॒ गावः॑ समिधा॒नं बु॑धन्त ॥४॥

ई॒ळेन्यः॑ । वः॒ । मनु॑षः । यु॒गेषु॑ । स॒म॒न॒ऽगाः । अ॒शु॒च॒त् । जा॒तऽवे॑दाः । सु॒ऽस॒न्दृशा॑ । भा॒नुना॑ । यः । वि॒ऽभाति॑ । प्रति॑ । गावः॑ । स॒म्ऽइ॒धा॒नम् । बु॒ध॒न्त॒ ॥

Mantra without Swara
ईळेन्यो वो मनुषो युगेषु समनगा अशुचज्जातवेदाः। सुसंदृशा भानुना यो विभाति प्रति गावः समिधानं बुधन्त ॥

ईळेन्यः। वः। मनुषः। युगेषु। समनऽगाः। अशुचत्। जातऽवेदाः। सुऽसन्दृशा। भानुना। यः। विऽभाति। प्रति। गावः। सम्ऽइधानम्। बुधन्त ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 12 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (ईळेन्यः) स्तुति के योग्य (समनगाः) संग्राम को प्राप्त होनेवाला (जातवेदाः) विद्या को प्राप्त हुआ (युगेषु) बहुत वर्षों में (वः) तुम (मनुषः) मनुष्यों को (सुसन्दृशा) अच्छे प्रकार दिखानेवाले (भानुना) किरण से सूर्य के समान (विभाति) प्रकाशित करता है और जैसे (समिधानम्) देदीप्यमान के (प्रति) प्रति (गावः) किरण (बुधन्त) बोध के हेतु होते हैं, वैसे (अशुचत्) शुद्ध प्रतीति कराता है, वही मनुष्यों में उत्तम होता है ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य्य के सदृश शुभ गुणों का ग्रहण कराके मनुष्यों को प्रकाशित करते हैं, वे प्रशंसा करने योग्य होते हैं ॥४॥
Subject
फिर कौन प्रशंसा योग्य होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥