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Rigveda Mandal 7 / Sukta 9 / Mantra 3

104 Sukta
6 Mantra
7/9/3
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिक्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अमू॑रः क॒विरदि॑तिर्वि॒वस्वा॑न्त्सुसं॒सन्मि॒त्रो अति॑थिः शि॒वो नः॑। चि॒त्रभा॑नुरु॒षसां॑ भा॒त्यग्रे॒ऽपां गर्भः॑ प्र॒स्व१॒॑ आ वि॑वेश ॥३॥

अमू॑रः । क॒विः । अदि॑तिः । वि॒वस्वा॑न् । सु॒ऽसं॒सत् । मि॒त्रः । अति॑थिः । शि॒वः । नः॒ । चि॒त्रऽभा॑नुः । उ॒षसा॑म् । भा॒ति॒ । अग्रे॑ । अ॒पाम् । गर्भः॑ । प्र॒ऽस्वः॑ । आ । वि॒वे॒श॒ ॥

Mantra without Swara
अमूरः कविरदितिर्विवस्वान्त्सुसंसन्मित्रो अतिथिः शिवो नः। चित्रभानुरुषसां भात्यग्रेऽपां गर्भः प्रस्व१ आ विवेश ॥

अमूरः। कविः। अदितिः। विवस्वान्। सुऽसंसत्। मित्रः। अतिथिः। शिवः। नः। चित्रऽभानुः। उषसाम्। भाति। अग्रे। अपाम्। गर्भः। प्रऽस्वः। आ। विवेश ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 12 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (उषसाम्) प्रभात वेलाओं के (अग्रे) पहिले (चित्रभानुः) अद्भुत प्रकाशयुक्त (विवस्वान्) सूर्य के समान (अपाम्) अन्तरिक्ष के बीच (गर्भः) गर्भ के तुल्य वर्त्तमान (प्रस्वः) अपने सम्बन्धी उत्तम जनोंवाला हुआ (भाति) प्रकाशित होता है (सु, संसत्) सुन्दर सभावाला (मित्रः) मित्र (अमूरः) मूढ़ता रहित (कविः) प्रवृत्त बुद्धिवाला पण्डित (अदितिः) पिता के तुल्य वर्त्तमान (अतिथिः) प्राप्त हुए विद्वान् के तुल्य (नः) हमारा (शिव) मङ्गलकारी हुआ (आ, विवेश) प्रवेश करता है, वही विद्वान् सब को सत्कार करने योग्य होता है ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो विद्वानों में मुखिया, सूर्य के तुल्य सत्य-न्याय का प्रकाशक, अविद्यादि दोषों से रहित, धर्मात्मा, विद्वान्, पुत्र के तुल्य प्रजाओं का पालन करता है, वही अतिथि के तुल्य सत्कार करने योग्य होता है ॥३॥
Subject
फिर कैसा विद्वान् पूजनीय होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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