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Rigveda Mandal 7 / Sukta 9 / Mantra 2

104 Sukta
6 Mantra
7/9/2
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिक्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स सु॒क्रतु॒र्यो वि दुरः॑ पणी॒नां पु॑ना॒नो अ॒र्कं पु॑रु॒भोज॑सं नः। होता॑ म॒न्द्रो वि॒शां दमू॑नास्ति॒रस्तमो॑ ददृशे रा॒म्याणा॑म् ॥२॥

सः । सु॒ऽक्रतुः॑ । यः । वि । दुरः॑ । प॒णी॒नाम् । पु॒ना॒नः । अ॒र्कम् । पु॒रु॒ऽभोज॑सम् । नः॒ । होता॑ । म॒न्द्रः । वि॒शाम् । दमू॑नाः । ति॒रः । तमः॑ । द॒दृ॒शे॒ । रा॒म्याणा॑म् ॥

Mantra without Swara
स सुक्रतुर्यो वि दुरः पणीनां पुनानो अर्कं पुरुभोजसं नः। होता मन्द्रो विशां दमूनास्तिरस्तमो ददृशे राम्याणाम् ॥

सः। सुऽक्रतुः। यः। वि। दुरः। पणीनाम्। पुनानः। अर्कम्। पुरुऽभोजसम्। नः। होता। मन्द्रः। विशाम्। दमूनाः। तिरः। तमः। ददृशे। राम्याणाम् ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 12 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (पणीनाम्) प्रशस्त व्यवहार करनेहारों के (दुरः) द्वारों को (पुनानः) पवित्र करता हुआ (राम्याणाम्) रात्रियों के (तमः) अन्धकार का (तिरः) तिरस्कार करके सूर्य (ददृशे) दीखता है तथा (सुक्रतुः) सुन्दर बुद्धिवाला (अर्कम्) अन्न वा सत्कार योग्य (पुरुभोजसम्) बहुतों के रक्षक मनुष्य को (वि) विशेष कर पवित्रकर्ता (नः) हमारी (विशाम्) प्रजाओं में (मन्द्रः) आनन्ददाता (होता) दानशील (दमूनाः) दमनशील अविद्या का तिरस्कार करता है (सः) वह हमारा राजा हो ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोमालङ्कार है। जो सभ्य राजा लोग सूर्य के तुल्य न्याय के प्रकाशक, अविद्यारूप अन्धकार के निवारक, दुष्टों का दमन और श्रेष्ठ धार्मिकों का सत्कार करनेवाले होते हुए धर्मसम्बन्धी मार्ग को पवित्र करते हैं, वे ही सब को सत्कार करने योग्य होते हैं ॥२॥
Subject
फिर राज कार्य्यों में कौन लोग श्रेष्ठ होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।