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Rigveda Mandal 7 / Sukta 8 / Mantra 4

104 Sukta
7 Mantra
7/8/4
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्रप्रा॒यम॒ग्निर्भ॑र॒तस्य॑ शृण्वे॒ वि यत्सूर्यो॒ न रोच॑ते बृ॒हद्भाः। अ॒भि यः पू॒रुं पृत॑नासु त॒स्थौ द्यु॑ता॒नो दैव्यो॒ अति॑थिः शुशोच ॥४॥

प्रऽप्र॑ । अ॒यम् । अ॒ग्निः । भ॒र॒तस्य॑ । शृ॒ण्वे॒ । वि । यत् । सूर्यः॑ । न । रोच॑ते । बृ॒हत् । भाः । अ॒भि । यः । पू॒रुम् । पृत॑नासु । त॒स्थौ । द्यु॒ता॒नः । दैव्यः॑ । अति॑थिः । शु॒शो॒च॒ ॥

Mantra without Swara
प्रप्रायमग्निर्भरतस्य शृण्वे वि यत्सूर्यो न रोचते बृहद्भाः। अभि यः पूरुं पृतनासु तस्थौ द्युतानो दैव्यो अतिथिः शुशोच ॥

प्रऽप्र। अयम्। अग्निः। भरतस्य। शृण्वे। वि। यत्। सूर्यः। न। रोचते। बृहत्। भाः। अभि। यः। पूरुम्। पृतनासु। तस्थौ। द्युतानः। दैव्यः। अतिथिः। शुशोच ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजपुरुष ! (यत्) जो (अयम्) यह (भरतस्य) धारण वा पोषण करनेवाले के (अग्निः) अग्नि के समान वा (सूर्य, नः) सूर्य के समान (वि, रोचते) विशेष प्रकाशित होता है वा जिसको मैं (प्रप्र, शृण्वे) अच्छे प्रकार सुनता हूँ (यः) जो (बृहत्) बड़े जगत् वा राज्य को तथा (पूरुम्) पालक सेनापति को (अभि, भाः) सब ओर से प्रकाशित करता है तथा (अतिथिः) जाने आने की तिथि जिसकी नियत न हो उसके तुल्य (दैव्यः) विद्वानों ने किया विद्वान् (द्युतानः) प्रकाशमान (पृतनासु) सेनाओं में (तस्थौ) स्थित हो वह (शुशोच) प्रकाशित होता है, उसका आप सदा सत्कार कीजिये ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जो राजा लोग सत्कर्म करनेवालों का ही सत्कार करें और दुष्टाचारियों को दण्ड देवें वे ही सूर्य के तुल्य प्रकाशमान अतिथियों के समान सत्कार करने योग्य होते हुए सर्वदा विजयी होकर प्रसिद्ध कीर्त्तिवाले होते हैं ॥४॥
Subject
फिर कैसा राजा सत्कार के योग्य होता और यह राजा कैसों का सत्कार करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥