Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 7 / Sukta 8 / Mantra 1

104 Sukta
7 Mantra
7/8/1
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- स्वराट्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ॒न्धे राजा॒ सम॒र्यो नमो॑भि॒र्यस्य॒ प्रती॑क॒माहु॑तं घृ॒तेन॑। नरो॑ ह॒व्येभि॑रीळते स॒बाध॒ आग्निरग्र॑ उ॒षसा॑मशोचि ॥१॥

इ॒न्धे । राजा॑ । सम् । अ॒र्यः । नमः॑ऽभिः । यस्य॑ । प्रती॑कम् । आऽहु॑तम् । घृ॒तेन॑ । नरः॑ । ह॒व्येभिः॑ । ई॒ळ॒ते॒ । स॒ऽबाधः॑ । आ । अ॒ग्निः । अग्रे॑ । उ॒षसा॑म् । अ॒शो॒चि॒ ॥

Mantra without Swara
इन्धे राजा समर्यो नमोभिर्यस्य प्रतीकमाहुतं घृतेन। नरो हव्येभिरीळते सबाध आग्निरग्र उषसामशोचि ॥

इन्धे। राजा। सम्। अर्यः। नमःऽभिः। यस्य। प्रतीकम्। आऽहुतम्। घृतेन। नरः। हव्येभिः। ईळते। सऽबाधः। आ। अग्निः। अग्रे। उषसाम्। अशोचि ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 11 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (नरः) नायक मनुष्य (हव्येभिः) देने योग्य जनों वा (नमोभिः) अन्नादि से होनेवाले सत्कारों के साथ (घृतेन) प्रदीप्तकारक जल वा घी से (यस्य) जिसकी (आहुतम्) स्पर्द्धा ईर्षा को प्राप्त (प्रतीकम्) सेना की निश्चय करानेवाली (ईळते) स्तुति करते हैं वह (समर्यः) युद्ध में कुशल (राजा) प्रकाशमान तेजस्वी मैं उनको (इन्धे) प्रदीप्त करता हूँ जैसे (उषसाम्) प्रभात समय होने से (अग्रे) पहिले (सबाधः) बाध अर्थात् संयोग से बने सब संसार के साथ वर्त्तमान (अग्निः) अग्नि के तुल्य तेजस्वी जन (आ, अशोचि) प्रकाशित किया जाता है, वैसे मैं शत्रुओं के सम्मुख अपनी सेना का प्रकाशक और उत्साह देनेवाला होऊँ ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो जिस के भृत्य उपकार करनेवाले हों, वे उपकार को प्राप्त हुए से सदा सत्कार पाने योग्य हैं ॥१॥
Subject
अब वह राजा कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥