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Rigveda Mandal 7 / Sukta 6 / Mantra 5

104 Sukta
7 Mantra
7/6/5
Devata- वैश्वानरः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यो दे॒ह्यो॒३॒॑अन॑मयद्वध॒स्नैर्यो अ॒र्यप॑त्नीरु॒षस॑श्च॒कार॑। स नि॒रुध्या॒ नहु॑षो य॒ह्वो अ॒ग्निर्विश॑श्चक्रे बलि॒हृतः॒ सहो॑भिः ॥५॥

यः । दे॒ह्यः॑ । अन॑मयत् । व॒ध॒ऽस्नैः । यः । अ॒र्यऽप॑त्नीः । उ॒षसः॑ । च॒कार॑ । सः । नि॒ऽरुध्य॑ । नहु॑षः । य॒ह्वः । अ॒ग्निः । विशः॑ । च॒क्रे॒ । ब॒लि॒ऽहृतः॑ । सहः॑ऽभिः ॥

Mantra without Swara
यो देह्यो३अनमयद्वधस्नैर्यो अर्यपत्नीरुषसश्चकार। स निरुध्या नहुषो यह्वो अग्निर्विशश्चक्रे बलिहृतः सहोभिः ॥

यः। देह्यः। अनमयत्। वधऽस्नैः। यः। अर्यऽपत्नीः। उषसः। चकार। सः। निऽरुध्य। नहुषः। यह्वः। अग्निः। विशः। चक्रे। बलिऽहृतः। सहःऽभिः ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 9 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो (यः) जो (देह्यः) बढ़ाने योग्य (वधस्नैः) मारने से शुद्ध करनेवाले न्यायाधीशों से दुष्टों को (अनमयत्) नम्र करावे (यः) जो सूर्य जैसे (उषसः) प्रातःकाल की वेलाओं को सुशोभित करता है, वैसे (अर्यपत्नीः) स्वामी की स्त्रियों को शोभित (चकार) करता है और जो (नहुषः) सत्य में बद्ध (यह्वः) महान् (अग्निः) अग्नि के तुल्य तेजस्वी (सहोभिः) सहनशील बलिष्ठों के साथ शत्रुओं को (निरुध्या) रोक के (विशः) प्रजाओं को (बलिहृतः) कर पहुँचानेवाला (चक्रे) करे (सः) वह सब को पिता के तुल्य पूज्य है ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे प्रजाजनो ! जो अत्यन्त विद्वान् दुष्टाचारियों और अन्याय के वर्त्ताव को रोक जितेन्द्रिय होके न्यायपूर्वक प्रजा से कर लेता है, वह सब को बढ़ाने योग्य होता है ॥५॥
Subject
फिर कैसा राजा अत्यन्त उत्तम होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥