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Rigveda Mandal 7 / Sukta 5 / Mantra 9

104 Sukta
9 Mantra
7/5/9
Devata- वैश्वानरः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तं नो॑ अग्ने म॒घव॑द्भ्यः पुरु॒क्षुं र॒यिं नि वाजं॒ श्रुत्यं॑ युवस्व। वैश्वा॑नर॒ महि॑ नः॒ शर्म॑ यच्छ रु॒द्रेभि॑रग्ने॒ वसु॑भिः स॒जोषाः॑ ॥९॥

तम् । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । म॒घव॑त्ऽभ्यः । पु॒रु॒ऽक्षुम् । र॒यिम् । नि । वाज॑म् । श्रुत्य॑म् । यु॒व॒स्व॒ । वैश्वा॑नर । महि॑ । नः॒ । शर्म॑ । य॒च्छ॒ । रु॒द्रेभिः॑ । अ॒ग्ने॒ । वसु॑ऽभिः । स॒ऽजोषाः॑ ॥

Mantra without Swara
तं नो अग्ने मघवद्भ्यः पुरुक्षुं रयिं नि वाजं श्रुत्यं युवस्व। वैश्वानर महि नः शर्म यच्छ रुद्रेभिरग्ने वसुभिः सजोषाः ॥

तम्। नः। अग्ने। मघवत्ऽभ्यः। पुरुऽक्षुम्। रयिम्। नि। वाजम्। श्रुत्यम्। युवस्व। वैश्वानर। महि। नः। शर्म। यच्छ। रुद्रेभिः। अग्ने। वसुऽभिः। सऽजोषाः ॥९॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 8 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वैश्वानर) सब को अपने-अपने कार्य में लगानेवाले (अग्ने) अग्नि के तुल्य प्रकाशित जगदीश्वर आप (मघवद्भ्यः) बहुत धनयुक्त हमारे लिये (पुरुक्षुम्) बहुत अन्नादि (तम्) उस (श्रुत्यम्) सुनने योग्य (रयिम्) धन को और (वाजम्) विज्ञान को (नि, युवस्व) नित्य संयुक्त करो। हे (अग्ने) प्राण के प्राण ! (वसुभिः) पृथिवी आदि तथा (रुद्रेभिः) प्राणों के साथ (सजोषाः) व्याप्त और प्रसन्न हुए आप (नः) हमारे लिये (महि) बड़े (शर्म) सुख वा घर को (यच्छ) दीजिये ॥९॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो परमात्मा धन ऐश्वर्य्य और प्रशंसा के योग्य विज्ञान और राज्य को पुरुषार्थियों के लिये देता है, उसी की प्रीतिपूर्वक निरन्तर उपासना किया करो ॥९॥ इस सूक्त में ईश्वर के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह पाँचवाँ सूक्त और आठवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर वह ईश्वर क्या क्या देता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥