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Rigveda Mandal 7 / Sukta 5 / Mantra 8

104 Sukta
9 Mantra
7/5/8
Devata- वैश्वानरः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ताम॑ग्ने अ॒स्मे इष॒मेर॑यस्व॒ वैश्वा॑नर द्यु॒मतीं॑ जातवेदः। यया॒ राधः॒ पिन्व॑सि विश्ववार पृ॒थु श्रवो॑ दा॒शुषे॒ मर्त्या॑य ॥८॥

ताम् । अ॒ग्ने॒ । अ॒स्मे इति॑ । इष॑म् । आ । ई॒र॒य॒स्व॒ । वैश्वा॑नर । द्यु॒ऽमती॑म् । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । यया॑ । राधः॑ । पिन्व॑सि । वि॒श्व॒ऽवा॒र॒ । पृ॒थु । श्रवः॑ । दा॒शुषे॑ । मर्त्या॑य ॥

Mantra without Swara
तामग्ने अस्मे इषमेरयस्व वैश्वानर द्युमतीं जातवेदः। यया राधः पिन्वसि विश्ववार पृथु श्रवो दाशुषे मर्त्याय ॥

ताम्। अग्ने। अस्मे इति। इषम्। आ। ईरयस्व। वैश्वानर। द्युऽमतीम्। जातऽवेदः। यया। राधः। पिन्वसि। विश्वऽवार। पृथु। श्रवः। दाशुषे। मर्त्याय ॥८॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 8 Mantra » 3

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Meaning
हे (वैश्वानर) सब में प्रकाशमान (जातवेदः) उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान (विश्ववार) सब से स्वीकार करने योग्य (अग्ने) विज्ञानस्वरूप ईश्वर ! आप (दाशुषे) विद्या देनेवाले (मर्त्याय) मनुष्य के लिये (यया) जिससे (पृथु) विस्तारयुक्त (राधः) धन और (श्रवः) श्रवण को (पिन्वसि) देते हो (ताम्) उस (द्युमतीम्) प्रशस्त कामनावाले (इषम्) अन्नादि को (अस्मे) हमारे लिये (आ, ईरयस्व) प्राप्त कीजिये ॥८॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिसकी उपासना से विद्वान् लोग पूर्ण विद्या को प्राप्त होते हैं, जो उपासना किया हुआ समस्त ऐश्वर्य को देता है, उसी की नित्य सेवा करो ॥८॥
Subject
फिर वह ईश्वर किसको क्या देता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

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