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Rigveda Mandal 7 / Sukta 5 / Mantra 3

104 Sukta
9 Mantra
7/5/3
Devata- वैश्वानरः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वद्भि॒या विश॑ आय॒न्नसि॑क्नीरसम॒ना जह॑ती॒र्भोज॑नानि। वैश्वा॑नर पू॒रवे॒ शोशु॑चानः॒ पुरो॒ यद॑ग्ने द॒रय॒न्नदी॑देः ॥३॥

त्वत् । भि॒या । विशः॑ । आ॒य॒न् । असि॑क्नीः । अ॒स॒म॒नाः । जह॑तीः । भोज॑नानि । वैश्वा॑नर । पू॒रवे॑ । शोशु॑चानः । पुरः॑ । यत् । अ॒ग्ने॒ । द॒रय॑न् । अदी॑देः ॥

Mantra without Swara
त्वद्भिया विश आयन्नसिक्नीरसमना जहतीर्भोजनानि। वैश्वानर पूरवे शोशुचानः पुरो यदग्ने दरयन्नदीदेः ॥

त्वत्। भिया। विशः। आयन्। असिक्नीः। असमनाः। जहतीः। भोजनानि। वैश्वानर। पूरवे। शोशुचानः। पुरः। यत्। अग्ने। दरयन्। अदीदेः ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 7 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वैश्वानर) सर्वत्र विराजमान (अग्ने) सूर्य के तुल्य प्रकाशस्वरूप ! (यत्) जो आप दुःखों को (दरयन्) विदीर्ण करते हुए (पूरवे) मनुष्य के लिये (शोशुचानः) पवित्रविज्ञान को (पुरः) पहिले (अदीदेः) प्रकाशित करें इससे (त्वत्) आपके (भिया) भय से (असिक्नीः) रात्रियों के प्रति (असमनाः) पृथक्-पृथक् वर्त्तमान (भोजनानि) भोगने योग्य वा पालन और (जहतीः) अपनी पूर्वावस्था को त्यागती हुई (विशः) प्रजा (आयन्) मर्यादा को प्राप्त हों ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! जिस परमेश्वर के भय से वायु आदि पदार्थ अपने-अपने काम में नियुक्त होते हैं, उसके सत्य-न्याय के भय से सब जीव अधर्म से भय कर धर्म में रुचि करते हैं। जिसके प्रभाव से पृथिवी सूर्य्य आदि लोक अपनी अपनी परिधि में नियम से भ्रमते हैं, अपने स्वरूप का धारण कर जगत् का उपकार करते हैं, वही परमात्मा सब को ध्यान करने योग्य है ॥३॥
Subject
फिर वह परमेश्वर कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥