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Rigveda Mandal 7 / Sukta 5 / Mantra 1

104 Sukta
9 Mantra
7/5/1
Devata- वैश्वानरः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्राग्नये॑ त॒वसे॑ भरध्वं॒ गिरं॑ दि॒वो अ॑र॒तये॑ पृथि॒व्याः। यो विश्वे॑षाम॒मृता॑नामु॒पस्थे॑ वैश्वान॒रो वा॑वृ॒धे जा॑गृ॒वद्भिः॑ ॥१॥

प्र । अ॒ग्नये॑ । त॒वसे॑ । भ॒र॒ध्व॒म् । गिर॑म् । दि॒वः । अ॒र॒तये॑ । पृ॒थि॒व्याः । यः । विश्वे॑षाम् । अ॒मृता॑नाम् । उ॒पऽस्थे॑ । वै॒श्वा॒न॒रः । व॒वृ॒धे । जा॒गृ॒वत्ऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
प्राग्नये तवसे भरध्वं गिरं दिवो अरतये पृथिव्याः। यो विश्वेषाममृतानामुपस्थे वैश्वानरो वावृधे जागृवद्भिः ॥

प्र। अग्नये। तवसे। भरध्वम्। गिरम्। दिवः। अरतये। पृथिव्याः। यः। विश्वेषाम्। अमृतानाम्। उपऽस्थे। वैश्वानरः। ववृधे। जागृवत्ऽभिः ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 7 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो (यः) जो (वैश्वानरः) सम्पूर्ण मनुष्यों में प्रकाशमान जगदीश्वर (दिवः) सूर्य वा (पृथिव्याः) पृथिवी के बीच (विश्वेषाम्) सब (अमृतानाम्) नाशरहित जीवात्माओं वा प्रकृति आदि के (उपस्थे) समीप में (वावृधे) बढ़ाता है (जागृवद्भिः) अविद्या निद्रा से उठनेवाले ही उसको प्राप्त होते उस (तवसे) बलिष्ठ (अरतये) व्याप्त (अग्नये) परमात्मा के लिये (गिरम्) योगसंस्कार से युक्त वाणी को (प्र, भरध्वम्) धारण करो अर्थात् स्तुति प्रार्थना करो ॥१॥
Essence
यदि सब मनुष्य सब के धर्त्ता योगियों को प्राप्त होने योग्य परमेश्वर की उपासना करें तो वे सब ओर से वृद्धि को प्राप्त हों ॥१॥
Subject
अब नौ ऋचावाले पाँचवें सूक्त का आरम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में किसकी प्रशंसा और उपासना करनी चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥