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Rigveda Mandal 7 / Sukta 44 / Mantra 5

104 Sukta
5 Mantra
7/44/5
Devata- लिङ्गोक्ताः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ नो॑ दधि॒क्राः प॒थ्या॑मनक्त्वृ॒तस्य॒ पन्था॒मन्वे॑त॒वा उ॑। शृ॒णोतु॑ नो॒ दैव्यं॒ शर्धो॑ अ॒ग्निः शृ॒ण्वन्तु॒ विश्वे॑ महि॒षा अमू॑राः ॥

आ । नः॒ । द॒धि॒ऽक्राः । प॒थ्या॑म् । अ॒न॒क्तु॒ । ऋ॒तस्य॑ । पन्था॑म् । अनु॑ऽए॒त॒वै । ऊँ॒ इति॑ । शृ॒णोतु॑ । नः॒ । दैव्य॑म् । शर्धः॑ । अ॒ग्निः । शृ॒ण्वन्तु॑ । विश्वे॑ । म॒हि॒षाः । अमू॑राः ॥

Mantra without Swara
आ नो दधिक्राः पथ्यामनक्त्वृतस्य पन्थामन्वेतवा उ। शृणोतु नो दैव्यं शर्धो अग्निः शृण्वन्तु विश्वे महिषा अमूराः ॥

आ। नः। दधिऽक्राः। पथ्याम्। अनक्तु। ऋतस्य। पन्थाम्। अनुऽएतवै। ऊँ इति। शृणोतु। नः। दैव्यम्। शर्धः। अग्निः। शृण्वन्तु। विश्वे। महिषाः। अमूराः ॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 11 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! आप (दधिक्राः) घोड़े के समान धारण करनेवालों को चलानेवाले (पथ्याम्) मार्ग में सिद्धि करने वाली गति के समान (नः) हम लोगों के (ऋतस्य) सत्य वा जल (पन्थाम्) मार्ग के (अन्वेतवै) पीछे जाने को (आ, अनक्तु) कामना करें (उ) और (अग्निः) बिजुली के समान शीघ्र जावें और (नः) हमारे (दैव्यम्) विद्वानों ने उत्पन्न किये (शर्धः) शरीर और आत्मा के बल को (शृणोतु) सुनें (महिषाः) महान् (विश्वे) सब (अमूराः) अमूढ़ अर्थात् विज्ञानवान् जन हमारे विद्वानों ने =के सिद्ध किये हुए वचन को (शृण्वन्तु) सुनें ॥५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे परीक्षक न्यायाधीश वा राजा सब के वचनों को सुन के सत्य और असत्य का निश्चय करता और अग्नि आदि का प्रयोग कर शीघ्र मार्ग को जाता है, वैसे ही तुम लोग विद्वानों से सुन कर धर्मयुक्त मार्ग से अपना व्यवहार कर मूढ़ता छोड़ो और छुड़ाओ ॥५॥ इस सूक्त में अग्निरूपी घोड़ों के गुण और कामों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह चवालीसवाँ सूक्त और ग्यारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर विद्वान् जन क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥