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Rigveda Mandal 7 / Sukta 43 / Mantra 5

104 Sukta
5 Mantra
7/43/5
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिक्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒वा नो॑ अग्ने वि॒क्ष्वा द॑शस्य॒ त्वया॑ व॒यं स॑हसाव॒न्नास्क्राः॑। रा॒या यु॒जा स॑ध॒मादो॒ अरि॑ष्टा यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥५॥

ए॒व । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । वि॒क्षु । आ । द॒श॒स्य॒ । त्वया॑ । व॒यम् । स॒ह॒सा॒ऽव॒न् । आस्क्राः॑ । रा॒या । यु॒जा । स॒ध॒ऽमादः॑ । अरि॑ष्टाः । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
एवा नो अग्ने विक्ष्वा दशस्य त्वया वयं सहसावन्नास्क्राः। राया युजा सधमादो अरिष्टा यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

एव। नः। अग्ने। विक्षु। आ। दशस्य। त्वया। वयम्। सहसाऽवन्। आस्क्राः। राया। युजा। सधऽमादः। अरिष्टाः। यूयम्। पात। स्वस्तिऽभिः। सदा। नः ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 10 Mantra » 5

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Meaning
हे (सहसावन्) बहुबलयुक्त (अग्ने) विद्वान् ! आप (विक्षु) प्रजाजनों में (नः) हम लोगों को धन (दशस्य) देओ जिससे (त्वया) तुम्हारे साथ (युजा) युक्त (वयम्) हम लोग (राया) धन से (सधमादः) तुल्य स्थानवाले (आस्क्राः) सब ओर से बुलावें और (अरिष्टाः) अविनष्ट हों (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुखों से (नः) हम लोगों की (सदा) सर्वदा (पात) रक्षा करो (एव) उन्हीं की हम लोग भी रक्षा करें ॥५॥
Essence
हे विद्वानो ! तुम हम को विद्या देओ, जिससे हम लोग प्रजाजनों में उत्तम धन आदि पाकर तुम्हारी सदैव रक्षा करें ॥५॥ इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुण और कामों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह तयालीसवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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