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Rigveda Mandal 7 / Sukta 43 / Mantra 1

104 Sukta
5 Mantra
7/43/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र वो॑ य॒ज्ञेषु॑ देव॒यन्तो॑ अर्च॒न्द्यावा॒ नमो॑भिः पृथि॒वी इ॒षध्यै॑। येषां॒ ब्रह्मा॒ण्यस॑मानि॒ विप्रा॒ विष्व॑ग्वि॒यन्ति॑ व॒निनो॒ न शाखाः॑ ॥१॥

प्र । वः॒ । य॒ज्ञेषु॑ । दे॒व॒ऽयन्तः॑ । अ॒र्च॒न् । द्यावा॑ । नमः॑ऽभिः । पृ॒थि॒वी इति॑ । इ॒षध्यै॑ । येषा॑म् । ब्रह्मा॑णि । अस॑मानि । विप्राः॑ । विष्व॑क् । वि॒ऽयन्ति॑ । व॒निनः॑ । न । शाखाः॑ ॥

Mantra without Swara
प्र वो यज्ञेषु देवयन्तो अर्चन्द्यावा नमोभिः पृथिवी इषध्यै। येषां ब्रह्माण्यसमानि विप्रा विष्वग्वियन्ति वनिनो न शाखाः ॥

प्र। वः। यज्ञेषु। देवऽयन्तः। अर्चन्। द्यावा। नमःऽभिः। पृथिवी इति। इषध्यै। येषाम्। ब्रह्माणि। असमानि। विप्राः। विष्वक्। विऽयन्ति। वनिनः। न। शाखाः ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 10 Mantra » 1

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Meaning
हे (विप्राः) बुद्धिमानो ! (येषाम्) जिनको (असमानि) औरों के धनों से न समान किन्तु अधिक (ब्रह्माणि) धन वा अन्न (वनिनः) वन सम्बन्ध रखने और (शाखाः) अन्तरिक्ष में सोनेवाली शाखाओं के (न) समान (विष्वक्) अनुकूल व्याप्ति जैसे हो, वैसे (वि, यन्ति) व्याप्त होते हैं वा जो (नमोभिः) अन्नादिकों से (इषध्यै) इच्छा करने वा जानने को (द्यावापृथिवी) सूर्य और भूमि की (यज्ञेषु) विद्याप्रचारादि व्यवहारों में (देवयन्तः) कामना करते हुए (वः) तुम लोगों का (प्रार्चन्) अच्छा सत्कार करते हैं, उनका तुम भी सत्कार करो ॥१॥
Essence
हे अतिथि विद्वानो ! जैसे गृहस्थ जन अन्नादि पदार्थों के साथ आपका सत्कार करें, वैसे तुम विज्ञानदान से गृहस्थों को निरन्तर प्रसन्न करो ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले तेतालीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर अतिथि और गृहस्थ एक दूसरे के लिये क्या-क्या देवें, इस विषय को कहते हैं ॥

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