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Rigveda Mandal 7 / Sukta 42 / Mantra 6

104 Sukta
6 Mantra
7/42/6
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒वाग्निं स॑ह॒स्यं१॒॑ वसि॑ष्ठो रा॒यस्का॑मो वि॒श्वप्स्न्य॑स्य स्तौत्। इषं॑ र॒यिं प॑प्रथ॒द्वाज॑म॒स्मे यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥६॥

ए॒व । अ॒ग्निम् । स॒ह॒स्य॑म् । वसि॑ष्ठः । रा॒यःऽका॑मः । वि॒श्वऽप्स्न्य॑स्य । स्तौ॒त् । इष॑म् । र॒यिम् । प॒प्र॒थ॒त् । वाज॑म् । अ॒स्मे इति॑ । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
एवाग्निं सहस्यं१ वसिष्ठो रायस्कामो विश्वप्स्न्यस्य स्तौत्। इषं रयिं पप्रथद्वाजमस्मे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

एव। अग्निम्। सहस्यम्। वसिष्ठः। रायःऽकामः। विश्वऽप्स्न्यस्य। स्तौत्। इषम्। रयिम्। पप्रथत्। वाजम्। अस्मे इति। यूयम्। पात। स्वस्तिऽभिः। सदा। नः ॥६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 9 Mantra » 6

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Meaning
जो (रायस्कामः) धन की कामनावाला (वसिष्ठः) अतीव निवासकर्ता जन (विश्वप्स्न्यस्य) समग्र रूपों में और (सहस्यम्) बल में हुए (अग्निम्) अग्नि की (स्तौत्) स्तुति करता है (एव) वही (अस्मे) हमारी (इषम्) अन्नादि सामग्री (रयिम्) लक्ष्मी (वाजम्) विज्ञान वा अन्न को (पप्रथत्) प्रसिद्ध करता है, हे अतिथि जनो ! (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुखों से (नः) हम लोगों की (सदा) सदैव (पात) रक्षा करो ॥६॥
Essence
जिसको धन की कामना हो, वह मनुष्य अग्न्यादि विद्या को ग्रहण करे, जो अतिथियों की सेवा करते हैं, उनको अतिथि लोग अधर्म के आचरण से सदा अलग रखते हैं ॥६॥ इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह बयालीसवाँ सूक्त और नवम वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
धन की कामना करनेवाले क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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