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Rigveda Mandal 7 / Sukta 42 / Mantra 4

104 Sukta
6 Mantra
7/42/4
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
य॒दा वी॒रस्य॑ रे॒वतो॑ दुरो॒णे स्यो॑न॒शीरति॑थिरा॒चिके॑तत्। सुप्री॑तो अ॒ग्निः सुधि॑तो॒ दम॒ आ स वि॒शे दा॑ति॒ वार्य॒मिय॑त्यै ॥४॥

य॒दा । वी॒रस्य॑ । रे॒वतः॑ । दु॒रो॒णे । स्यो॒न॒ऽशीः । अति॑थिः । आ॒ऽचिके॑तत् । सुऽप्री॑तः । अ॒ग्निः । सुऽधि॑तः । दमे॑ । आ । सः । वि॒शे । दा॒ति॒ । वार्य॑म् । इय॑त्यै ॥

Mantra without Swara
यदा वीरस्य रेवतो दुरोणे स्योनशीरतिथिराचिकेतत्। सुप्रीतो अग्निः सुधितो दम आ स विशे दाति वार्यमियत्यै ॥

यदा। वीरस्य। रेवतः। दुरोणे। स्योनऽशीः। अतिथिः। आऽचिकेतत्। सुऽप्रीतः। अग्निः। सुऽधितः। दमे। आ। सः। विशे। दाति। वार्यम्। इयत्यै ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 9 Mantra » 4

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Meaning
(यदा) जब (स्योनशीः) सुख से सोनेवाला (अतिथिः) सत्य उपदेशक (रेवतः) बहुत धनवाले (वीरस्य) वीर के (दुरोणे) घर में (आ, चिकेतत्) सब ओर से जानता है तब (सः) वह (अग्निः) अग्नि के समान पवित्र (सुधितः) अच्छा हित करनेवाला (सुप्रीतः) सुन्दर प्रसन्न गृहस्थ के (दमे) घर में (इयत्यै) सुखप्राप्ति की इच्छा के लिये (विशे) और प्रजा सन्तान के लिये (वार्यम्) स्वीकार करने योग्य विज्ञान को (आ,दाति) सब ओर से देता है ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जब विद्वान् धार्मिक उपदेश करनेवाला अतिथि जन तुम्हारे घरों को आवे तब अच्छे प्रकार उसका सत्कार करो, हे अतिथि ! जब जहाँ-जहाँ आप रमण भ्रमण करें, वहाँ-वहाँ सब के लिये सत्य उपदेश करें ॥४॥
Subject
फिर अतिथि और गृहस्थ परस्पर क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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