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Rigveda Mandal 7 / Sukta 42 / Mantra 3

104 Sukta
6 Mantra
7/42/3
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
समु॑ वो य॒ज्ञं म॑हय॒न्नमो॑भिः॒ प्र होता॑ म॒न्द्रो रि॑रिच उपा॒के। यज॑स्व॒ सु पु॑र्वणीक दे॒वाना य॒ज्ञिया॑म॒रम॑तिं ववृत्याः ॥३॥

सम् । ऊँ॒ इति॑ । वः॒ । य॒ज्ञम् । म॒ह॒य॒न् । नमः॑ऽभिः । प्र । होता॑ । म॒न्द्रः । रि॒रि॒चे॒ । उ॒पा॒के । यज॑स्व । सु । पु॒रु॒ऽअ॒नी॒क॒ । दे॒वान् । आ । य॒ज्ञिया॑म् । अ॒रऽम॑तिम् । व॒वृ॒त्याः॒ ॥

Mantra without Swara
समु वो यज्ञं महयन्नमोभिः प्र होता मन्द्रो रिरिच उपाके। यजस्व सु पुर्वणीक देवाना यज्ञियामरमतिं ववृत्याः ॥

सम्। ऊँ इति। वः। यज्ञम्। महयन्। नमःऽभिः। प्र। होता। मन्द्रः। रिरिचे। उपाके। यजस्व। सु। पुरुऽअनीक। देवान्। आ। यज्ञियाम्। अरऽमतिम्। ववृत्याः ॥३॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 9 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पुर्वणीक) बहुत सेनाओंवाले राजा ! आप (देवान्) विद्वानों को (सु, यजस्व) अच्छे प्रकार प्राप्त होओ (यज्ञियाम्) जो यज्ञ के योग्य होती उस (अरमतिम्) पूरी मति को (आ, ववृत्याः) प्रवृत्त कराओ (मन्द्रः) आनन्द देने वा (होता) दान करनेवाले होते हुए (उपाके) समीप में (प्र, रिरिचे) अन्याय से अलग रहिये, हे विद्वानो ! जो (नमोभिः) अन्नादिकों से (वः) तुम लोगों के (यज्ञम्) विद्याप्रचारमय यज्ञ का (सम्, महयन्) सम्मान करते हैं (उ) उन्हीं का तुम सत्कार करो ॥३॥
Essence
जो विद्वान् जन सत्कर्मानुष्ठानयज्ञ का अनुष्ठान करते हैं, वे पुष्कल वीर सेनावाले होते हुए सबको आनन्द देनेवाले होते हैं ॥३॥
Subject
फिर विद्वान् क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥