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Rigveda Mandal 7 / Sukta 41 / Mantra 1

104 Sukta
7 Mantra
7/41/1
Devata- लिङ्गोक्ताः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्रा॒तर॒ग्निं प्रा॒तरिन्द्रं॑ हवामहे प्रा॒तर्मि॒त्रावरु॑णा प्रा॒तर॒श्विना॑। प्रा॒तर्भगं॑ पू॒षणं॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिं॑ प्रा॒तः सोम॑मु॒त रु॒द्रं हु॑वेम ॥१॥

प्रा॒तः । अ॒ग्निम् । प्रा॒तः । इन्द्र॑म् । ह॒वा॒म॒हे॒ । प्रा॒तः। मि॒त्रावरु॑णा । प्रा॒तः । अ॒श्विना॑ । प्रा॒तः। भग॑म् । पू॒षण॑म् । ब्रह्म॑णः । पति॑म् । प्रा॒तः । सोम॑म् । उ॒त । रु॒द्रम् । हु॒वे॒म॒ ॥

Mantra without Swara
प्रातरग्निं प्रातरिन्द्रं हवामहे प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना। प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातः सोममुत रुद्रं हुवेम ॥

प्रातः। अग्निम्। प्रातः। इन्द्रम्। हवामहे। प्रातः। मित्रावरुणा। प्रातः। अश्विना। प्रातः। भगम्। पूषणम्। ब्रह्मणः। पतिम्। प्रातः। सोमम्। उत। रुद्रम्। हुवेम ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 8 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (प्रातः) प्रभात काल में (अग्निम्) अग्नि को (प्रातः) प्रभात समय में (इन्द्रम्) बिजुली वा सूर्य को (प्रातः) प्रातः समय (मित्रावरुणाः) प्राण और उदान के समान मित्र और राजा को तथा (प्रातः) प्रभात काल (अश्विना) सूर्य चन्द्रमा वैश्व वा पढ़ानेवालों की (हवामहे) विचार से प्रशंसा करें (प्रातः) प्रभात समय (भगम्) ऐश्वर्य्य को (पूषणम्) पुष्टि करनेवाले वायु को (ब्रह्मणस्पतिम्) वेद ब्रह्माण्ड वा सकलैश्वर्य के स्वामी जगदीश्वर को (सोमम्) समस्त ओषधियों को (उत) और (प्रातः) प्रभात समय (रुद्रम्) फल देने से पापियों को रुलानेवाले ईश्वर वा पाप फल भोगने से रोनेवाले जीव की (हुवेम) प्रशंसा करें, वैसे तुम भी प्रशंसा करो ॥१॥
Essence
मनुष्यों को रात्रि के पिछले पहर में उठ कर आवश्यक कार्य्य कर ध्यान से शरीरस्थ वा ब्रह्माण्डस्थ वा बिजुली, प्राण, उदान, मित्र, सूर्य, चन्द्रमा, ऐश्वर्य, पुष्टि, परमेश्वर, ओषधिगण और जीव विचार से जानने योग्य हैं, फिर अग्निहोत्रादि कामों से सब जगत् का उपकार कर कृतकृत्य होना चाहिये ॥१॥
Subject
अब सात ऋचावाले इक्तालीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में प्रातःकाल उठ के जब तक सोवें तब तक मनुष्यों को क्या-क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥