Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 7 / Sukta 40 / Mantra 4

104 Sukta
7 Mantra
7/40/4
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒यं हि ने॒ता वरु॑ण ऋ॒तस्य॑ मि॒त्रो राजा॑नो अर्य॒मापो॒ धुः। सु॒हवा॑ दे॒व्यदि॑तिरन॒र्वा ते नो॒ अंहो॒ अति॑ पर्ष॒न्नरि॑ष्टान् ॥४॥

अ॒यम् । हि । ने॒ता । वरु॑णः । ऋ॒तस्य॑ । मि॒त्रः । राजा॑नः । अ॒र्य॒मा । अपः॑ । धुरिति॒ धुः । सु॒ऽहवा॑ । दे॒वी । अदि॑तिः । अ॒न॒र्वा । ते । नः॒ । अंहः॑ । अति॑ । प॒र्ष॒न् । अरि॑ष्टान् ॥

Mantra without Swara
अयं हि नेता वरुण ऋतस्य मित्रो राजानो अर्यमापो धुः। सुहवा देव्यदितिरनर्वा ते नो अंहो अति पर्षन्नरिष्टान् ॥

अयम्। हि। नेता। वरुणः। ऋतस्य। मित्रः। राजानः। अर्यमा। अपः। धुरिति धुः। सुऽहवा। देवी। अदितिः। अनर्वा। ते। नः। अंहः। अति। पर्षन्। अरिष्टान् ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 7 Mantra » 4

Bhashya

More bhashyas
Meaning
जो (अयम्) यह (नेता) न्यायकर्त्ता (वरुणः) श्रेष्ठ (मित्रः) मित्र (अर्यमा) और न्यायाधीश (सुहवा) सुन्दर देने लेनेवाले (राजानः) राजजन (हि) ही (ऋतस्य) सत्य के (अपः) कर्म को (धुः) धारण करें (ते) वे (अनर्वा) नहीं है घोड़े की चाल जिस की उस (देवी) देदीप्यमान (अदितिः) अखण्डित नीति के समान (नः) हम लोगों को (अंहः) अपराध से (अरिष्टान्) न विनाश किये हुए (अति, पर्षन्) उल्लङ्घे अर्थात् छोड़े ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। वे ही राजा होते हैं, जो न्याय, श्रेष्ठ गुण और सबों में मित्रता की भावना कराते हैं, वे ही अपराध के आचरण से लोगों को दूर रखने योग्य होते हैं और राजा होने योग्य होते हैं ॥४॥
Subject
कौन राजा होने योग्य होते हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.