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Rigveda Mandal 7 / Sukta 40 / Mantra 1

104 Sukta
7 Mantra
7/40/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ओ श्रु॒ष्टिर्वि॑द॒थ्या॒३॒॑ समे॑तु॒ प्रति॒ स्तोमं॑ दधीमहि तु॒राणा॑म्। यद॒द्य दे॒वः स॑वि॒ता सु॒वाति॒ स्यामा॑स्य र॒त्निनो॑ विभा॒गे ॥१॥

ओ इति॑ । श्रु॒ष्टिः । वि॒द॒थ्या॑ । सम् । ए॒तु॒ । प्रति॑ । स्तोम॑म् । द॒धी॒म॒हि॒ । तु॒राणा॑म् । यत् । अ॒द्य । दे॒वः । स॒वि॒ता । सु॒वाति॑ । स्याम॑ । अ॒स्य॒ । र॒त्निनः॑ । वि॒ऽभा॒गे ॥

Mantra without Swara
ओ श्रुष्टिर्विदथ्या३ समेतु प्रति स्तोमं दधीमहि तुराणाम्। यदद्य देवः सविता सुवाति स्यामास्य रत्निनो विभागे ॥

ओ इति। श्रुष्टिः। विदथ्या। सम्। एतु। प्रति। स्तोमम्। दधीमहि। तुराणाम्। यत्। अद्य। देवः। सविता। सुवाति। स्याम। अस्य। रत्निनः। विऽभागे ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 7 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
(ओ) ओ विद्वान् ! जैसे (श्रुष्टिः) शीघ्र करनेवाला (विदथ्या) संग्रामादि व्यवहारों में हुई (तुराणाम्) शीघ्रकारियों के (प्रति, स्तोमम्) समूह-समूह के प्रति (सम्, एतु) अच्छे प्रकार प्राप्त होवे, वैसे इस समूह को हम लोग (दधीमहि) धारण करें (यत्) जो (अद्य) अब (देवः) विद्वान् (सविता) अच्छे कामों में प्रेरणा देनेवाला (विभागे) विशेष कर सेवने योग्य व्यवहार में (अस्य) इस विद्वान् के (रत्निनः) उन व्यवहारों को जिन में बहुत रत्न विद्यमान और स्तुति समूह को (सुवाति) उत्पन्न करता है, वैसे हम लोग उत्पन्न करनेवाले (स्याम) हों ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विदुषी माता सन्तानों की रक्षा कर और अच्छी शिक्षा देकर बढ़ाती है, वैसे विद्वान् जन हम को बढ़ावें ॥१॥
Subject
अब सात ऋचावाले चालीसवें सूक्त का प्रारम्भ किया जाता है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥