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Rigveda Mandal 7 / Sukta 4 / Mantra 8

104 Sukta
10 Mantra
7/4/8
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न॒हि ग्रभा॒यार॑णः सु॒शेवो॒ऽन्योद॑र्यो॒ मन॑सा॒ मन्त॒वा उ॑। अधा॑ चि॒दोकः॒ पुन॒रित्स ए॒त्या नो॑ वा॒ज्य॑भी॒षाळे॑तु॒ नव्यः॑ ॥८॥

न॒हि । ग्रभा॑य । अर॑णः । सु॒ऽशेवः॑ । अ॒न्यऽउ॑दर्यः । मन॑सा । मन्त॒वै । ऊँ॒ इति॑ । अध॑ । चि॒त् । ओकः॑ । पुनः॑ । इत् । सः । ए॒ति॒ । आ । नः॒ । वा॒जी । अ॒भी॒षाट् । ए॒तु॒ । नव्यः॑ ॥

Mantra without Swara
नहि ग्रभायारणः सुशेवोऽन्योदर्यो मनसा मन्तवा उ। अधा चिदोकः पुनरित्स एत्या नो वाज्यभीषाळेतु नव्यः ॥

नहि। ग्रभाय। अरणः। सुऽशेवः। अन्यऽउदर्यः। मनसा। मन्तवै। ऊँ इति। अध। चित्। ओकः। पुनः। इत्। सः। एति। आ। नः। वाजी। अभीषाट्। एतु। नव्यः ॥८॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 6 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्य ! जो (अरुणः) रमण न करता हुआ (सुशेवः) सुन्दर सुख से युक्त (अन्योदर्य्यः) दूसरे के उदर से उत्पन्न हुआ हो (सः) वह (मनसा) अन्तःकरण से (ग्रभाय) ग्रहण के लिये (नहि) नहीं (मन्तवै) मानने योग्य है (चित्, उ, पुनः, इत्) और भी फिर ही वह (ओकः) घर को नहीं (एति) प्राप्त होता (अध) इस के अनन्तर जो (नव्यः) नवीन (अभीषाट्) अच्छा सहनशील (वाजी) विज्ञानवाला (नः) हमको (आ, एतु) प्राप्त हो ॥८॥
Essence
हे मनुष्यो ! अन्य गोत्र में अन्य पुरुष से उत्पन्न हुए बालक को पुत्र करने के लिये नहीं ग्रहण करना चाहिये क्योंकि वह घर आदि का दायभागी नहीं हो सकता, किन्तु जो अपने शरीर से उत्पन्न वा अपने गोत्र से लिया हुआ हो, वही पुत्र वा पुत्र का प्रतिनिधि होवे ॥८॥
Subject
कौन पुत्र मानने के योग्य है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥