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Rigveda Mandal 7 / Sukta 4 / Mantra 5

104 Sukta
10 Mantra
7/4/5
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ यो योनिं॑ दे॒वकृ॑तं स॒साद॒ क्रत्वा॒ ह्य१॒॑ग्निर॒मृताँ॒ अता॑रीत्। तमोष॑धीश्च व॒निन॑श्च॒ गर्भं॒ भूमि॑श्च वि॒श्वधा॑यसं बिभर्ति ॥५॥

आ । यः । योनि॑म् । दे॒वऽकृ॑तम् । स॒साद॑ । क्रत्वा॑ । हि । अ॒ग्निः । अ॒मृता॑न् । अता॑रीत् । तम् । ओष॑धीः । च॒ । व॒निनः॑ । च॒ । गर्भ॑म् । भूमिः॑ । च॒ । वि॒श्वऽधा॑यसम् । बि॒भ॒र्ति॒ ॥

Mantra without Swara
आ यो योनिं देवकृतं ससाद क्रत्वा ह्य१ग्निरमृताँ अतारीत्। तमोषधीश्च वनिनश्च गर्भं भूमिश्च विश्वधायसं बिभर्ति ॥

आ। यः। योनिम्। देवऽकृतम्। ससाद। क्रत्वा। हि। अग्निः। अमृतान्। अतारीत्। तम्। ओषधीः। च। वनिनः। च। गर्भम्। भूमिः। च। विश्वऽधायसम्। बिभर्ति ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 5 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (अग्निः) अग्नि के तुल्य तेजस्वी (देवकृतम्) विद्वानों ने विद्या पढ़ने के अर्थ बनाये (योनिम्) घर में (आ, ससाद) अच्छे प्रकार निवास करे वह (हि) ही (क्रत्वा) बुद्धि से (अमृतान्) नाशरहित जीवों वा पदार्थों को (अतारीत्) तारता है (च) और जो (भूमिः) पृथिवी के तुल्य सहनशील पुरुष (तम्) उस (विश्वधायसम्) समस्त विद्याओं के धारण करनेवाले (गर्भम्) उपदेशक (च) और (ओषधिः) सोमादि ओषधियों (च) और (वनिनः) बहुत किरणोंवाले अग्नियों को (च) भी (बिभर्ति) धारण करता है, वही अतिपूज्य होता है ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि समिधा और होमने योग्य पदार्थों से बढ़ता है, वैसे ही जो पाठशाला में जा आचार्य को प्रसन्न कर ब्रह्मचर्य से विद्या का अभ्यास करते हैं, वे ओषधियों के तुल्य अविद्यारूप रोग के निवारक, सूर्य के तुल्य धर्म के प्रकाशक और पृथिवी के समान सब के धारण वा पोषणकर्त्ता होते हैं ॥५॥
Subject
कौन विद्वान् किसके तुल्य करता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥