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Rigveda Mandal 7 / Sukta 4 / Mantra 10

104 Sukta
10 Mantra
7/4/10
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒ता नो॑ अग्ने॒ सौभ॑गा दिदी॒ह्यपि॒ क्रतुं॑ सु॒चेत॑सं वतेम। विश्वा॑ स्तो॒तृभ्यो॑ गृण॒ते च॑ सन्तु यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥१०॥

ए॒ता । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । सौभ॑गा । दि॒दी॒हि॒ । अपि॑ । क्रतु॑म् । सु॒ऽचेत॑सम् । व॒ते॒म॒ । विश्वा॑ । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । गृ॒ण॒ते । च॒ । स॒न्तु॒ । यू॒यम् । पा॒त॒ । स्व॒स्तिऽभिः॑ । सदा॑ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
एता नो अग्ने सौभगा दिदीह्यपि क्रतुं सुचेतसं वतेम। विश्वा स्तोतृभ्यो गृणते च सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥

एता। नः। अग्ने। सौभगा। दिदीहि। अपि। क्रतुम्। सुऽचेतसम्। वतेम। विश्वा। स्तोतृऽभ्यः। गृणते। च। सन्तु। यूयम्। पात। स्वस्तिऽभिः। सदा। नः ॥१०॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 6 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वि राजन् ! आप (एता) इन (सौभगा) उत्तम ऐश्वर्य्यवाले पदार्थों को (नः) हमारे लिये (दिदीहि) प्रकाशित कीजिये (अपि) और तो (सुचेतसम्) सुन्दर ज्ञानयुक्त (क्रतुम्) बुद्धि को प्रकाशित कीजिये (स्तोतृभ्यः) ऋत्विजों के लिये (च) तथा (गृणते) यजमान के लिये उत्तम ऐश्वर्य्यवाले (सन्तु) हों जिससे (यूयम्) तुम लोग (स्वस्तिभिः) स्वस्थता करनेवाली क्रियाओं से (नः) हमारी (सदा) सदा (पात) रक्षा करो इसलिये हम लोग पूर्वोक्त बुद्धि और (विश्वा) धनों का (वतेम) सेवन करें ॥१०॥
Essence
हे राजन् ! यदि आप सब मनुष्यों को ब्रह्मचर्य्य के साथ विद्यादान दिलावें, ऋत्विजों और यजमानों को सर्वदा रक्षा करें तो स्वस्थता से पूर्ण राज्य के ऐश्वर्य्य को प्राप्त हों ॥१०॥ इस सूक्त में अग्नि, विद्वान्, राजा, वीर और प्रजा की रक्षा आदि कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह चौथा सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर राजा को क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥