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Rigveda Mandal 7 / Sukta 39 / Mantra 2

104 Sukta
7 Mantra
7/39/2
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र वा॑वृजे सुप्र॒या ब॒र्हिरे॑षा॒मा वि॒श्पती॑व॒ बीरि॑ट इयाते। वि॒शाम॒क्तोरु॒षसः॑ पू॒र्वहू॑तौ वा॒युः पू॒षा स्व॒स्तये॑ नि॒युत्वा॑न् ॥२॥

प्र । व॒वृजे॒ । सु॒ऽप्र॒या । ब॒र्हिः । ए॒षा॒म् । आ । वि॒श्पती॑ इ॒वेति वि॒श्पती॑ऽइव । बीरि॑टे । इ॒या॒ते॒ इति॑ । वि॒शाम् । अ॒क्तोः । उ॒षसः॑ । पू॒र्वऽहू॑तौ । वा॒युः । पू॒षा । स्व॒स्तये॑ । नि॒युत्वा॑न् ॥

Mantra without Swara
प्र वावृजे सुप्रया बर्हिरेषामा विश्पतीव बीरिट इयाते। विशामक्तोरुषसः पूर्वहूतौ वायुः पूषा स्वस्तये नियुत्वान् ॥

प्र। ववृजे। सुऽप्रया। बर्हिः। एषाम्। आ। विश्पती इवेति विश्पतीऽइव। बीरिटे। इयाते इति। विशाम्। अक्तोः। उषसः। पूर्वऽहूतौ। वायुः। पूषा। स्वस्तये। नियुत्वान् ॥२॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 6 Mantra » 2

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Meaning
जो स्त्री-पुरुष (बीरिटे) अन्तरिक्ष में सूर्य और चन्द्रमा के समान (इयाते) जाते हैं (विश्पतीव) वा प्रजा पालनेवाले राजा के समान (अक्तोः) रात्रि की (उषसः) और दिन की (पूर्वहूतौ) अगले विद्वानों ने की स्तुति के निमित्त जाते हैं वा (पूषा) पुष्टि करनेवाले (वायुः) प्राण के समान (नियुत्वान्) नियमकर्ता ईश्वर (विशाम्) प्रजाजनों के (स्वस्तये) सुख के लिये हो (एषाम्) इन में से जो कोई (सुप्रयाः) सब को अच्छे प्रकार तृप्त करता है वा (बर्हिः) उत्तम सब का बढ़ानेवाला कर्म(आ, प्र, वावृजे) सब ओर से अच्छे प्रकार प्राप्त होता है, उन सब का सब सत्कार करें ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। सदैव जो स्त्री-पुरुष न्यायकारी राजा के समानप्रजा पालना, ईश्वर के समान न्यायाचरण, पवन के समान प्रिय पदार्थ पहुँचाना और संन्यासी के तुल्य पक्षपात और मोहादि दोष त्याग करनेवाले होते हैं, वे सर्वार्थ सिद्ध हों ॥२॥
Subject
फिर वे स्त्री-पुरुष क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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