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Rigveda Mandal 7 / Sukta 38 / Mantra 6

104 Sukta
8 Mantra
7/38/6
Devata- सविता, सविता भगो वा Rishi- वसिष्ठः Chhanda- स्वराट्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अनु॒ तन्नो॒ जास्पति॑र्मंसीष्ट॒ रत्नं॑ दे॒वस्य॑ सवि॒तुरि॑या॒नः। भग॑मु॒ग्रोऽव॑से॒ जोह॑वीति॒ भग॒मनु॑ग्रो॒ अध॑ याति॒ रत्न॑म् ॥६॥

अनु॑ । तत् । नः॒ । जाःऽपतिः॑ । मं॒सी॒ष्ट॒ । रत्न॑म् । दे॒वस्य॑ । स॒वि॒तुः । इ॒या॒नः । भग॑म् । उ॒ग्रः । अव॑से । जोह॑वीति । भग॑म् । अनु॑ग्रः । अध॑ । या॒ति॒ । रत्न॑म् ॥

Mantra without Swara
अनु तन्नो जास्पतिर्मंसीष्ट रत्नं देवस्य सवितुरियानः। भगमुग्रोऽवसे जोहवीति भगमनुग्रो अध याति रत्नम् ॥

अनु। तत्। नः। जाःऽपतिः। मंसीष्ट। रत्नम्। देवस्य। सवितुः। इयानः। भगम्। उग्रः। अवसे। जोहवीति। भगम्। अनुग्रः। अध। याति। रत्नम् ॥६॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 5 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (उग्रः) तेजस्वी (जास्पतिः) प्रजा पालनेवाला (सवितुः) सर्वान्तर्यामी (देवस्य) सब प्रकाश करनेवाले के (भगम्) ऐश्वर्य्य को (इयानः) प्राप्त होता हुआ जिस (रत्नम्) रमणीय धन को स्वार्थ (मंसीष्ट) मानता है (तत्) उस को (नः) हम लोगों के लिये (अनु) अनुकूल माने जिस (भगम्) ऐश्वर्य्य को (अवसे) रक्षा आदि के (अनुग्रः) तेजरहित जन (जोहवीति) निरन्तर ग्रहण करता है वह (रत्नम्) रमणीय धन (अधः) हीन दशा को (याति) प्राप्त होता है ॥६॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो राजा परमेश्वर की सृष्टि में सब की रक्षा के लिये प्रवृत्त होता है, वही सब ऐश्वर्य को पाकर सब को आनन्दित कराता है ॥६॥
Subject
फिर राजा आदि मनुष्यों को क्या करके क्या प्राप्त करने योग्य है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥