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Rigveda Mandal 7 / Sukta 38 / Mantra 5

104 Sukta
8 Mantra
7/38/5
Devata- सविता Rishi- वसिष्ठः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒भि ये मि॒थो व॒नुषः॒ सप॑न्ते रा॒तिं दि॒वो रा॑ति॒षाचः॑ पृथि॒व्याः। अहि॑र्बु॒ध्न्य॑ उ॒त नः॑ शृणोतु॒ वरू॒त्र्येक॑धेनुभि॒र्नि पा॑तु ॥५॥

अ॒भि । ये । मि॒थः । व॒नुषः॑ । सप॑न्ते । रा॒तिम् दि॒वः । रा॒ति॒ऽसाचः॑ । पृ॒थि॒व्याः । अहिः॑ । बु॒ध्न्यः॑ । उ॒त । नः॒ । शृ॒णो॒तु॒ । वरू॑त्री । एक॑धेनुऽभिः । नि । पा॒तु॒ ॥

Mantra without Swara
अभि ये मिथो वनुषः सपन्ते रातिं दिवो रातिषाचः पृथिव्याः। अहिर्बुध्न्य उत नः शृणोतु वरूत्र्येकधेनुभिर्नि पातु ॥

अभि। ये। मिथः। वनुषः। सपन्ते। रातिम् दिवः। रातिऽसाचः। पृथिव्याः। अहिः। बुध्न्यः। उत। नः। शृणोतु। वरूत्री। एकधेनुऽभिः। नि। पातु ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 5 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
(ये) जो (दिवः) मनोहर (रातिषाचः) दान देनेवाले के (एकधेनुभिः) एक वाणी ही है सहायक जिनकी उनके साथ (मिथः) परस्पर (वनुषः) माँगते हुए (नः) हम लोगों की (रातिम्) देने को (अभि, सपन्ते) अच्छे प्रकार सब ओर से नियम करते हैं (उत) और (वरूत्री) स्वीकार करने योग्य माता (बुध्न्यः) अन्तरिक्ष में प्रसिद्ध हुए (अहिः) मेघ के समान हम लोगों को (पृथिव्याः) भूमि और अन्तरिक्ष के बीच (नि, पातु) निरन्तर रक्षा करे, वह समस्त जनमात्र हमारा पढ़ा हुआ (शृणोतु) सुने ॥५॥
Essence
जो हम लोगों को विद्याहीन देख निन्दा करते और विद्वान् देख प्रशंसा करते और एकता के लिये प्रेरणा देते हैं, वे ही हमारे कल्याण करनेवाले होते हैं ॥५॥
Subject
फिर मनुष्य परस्पर क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥