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Rigveda Mandal 7 / Sukta 38 / Mantra 4

104 Sukta
8 Mantra
7/38/4
Devata- सविता Rishi- वसिष्ठः Chhanda- स्वराट्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒भि यं दे॒व्यदि॑तिर्गृ॒णाति॑ स॒वं दे॒वस्य॑ सवि॒तुर्जु॑षा॒णा। अ॒भि स॒म्राजो॒ वरु॑णो गृणन्त्य॒भि मि॒त्रासो॑ अर्य॒मा स॒जोषाः॑ ॥४॥

अ॒भि । यम् । दे॒वी । अदि॑तिः । गृ॒णाति॑ । स॒वम् । दे॒वस्य॑ । स॒वि॒तुः । जु॒षा॒णा । अ॒भि । स॒म्ऽराजः॑ । वरु॑णः । गृ॒ण॒न्ति॒ । अ॒भि । मि॒त्रासः॑ । अ॒र्य॒मा । स॒ऽजोषाः॑ ॥

Mantra without Swara
अभि यं देव्यदितिर्गृणाति सवं देवस्य सवितुर्जुषाणा। अभि सम्राजो वरुणो गृणन्त्यभि मित्रासो अर्यमा सजोषाः ॥

अभि। यम्। देवी। अदितिः। गृणाति। सवम्। देवस्य। सवितुः। जुषाणा। अभि। सम्ऽराजः। वरुणः। गृणन्ति। अभि। मित्रासः। अर्यमा। सऽजोषाः ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 5 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! (सवितुः) प्रेरणा देनेवाला अन्तर्यामी (देवस्य) सर्व सुखदाता जगदीश्वर के (सवम्) उत्पन्न किये जगत् की (जुषाणा) सेवा करती हुई (देवी) विदुषी (अदितिः) माता जिस को (अभि, गृणाति) सम्मुख कहती है वा (वरुणः) श्रेष्ठ विद्वान् जन (सजोषाः) समान प्रीति सेवनेवाला (अर्यमा) न्यायाधीश और (मित्रासः) सब के सुहृद् (सम्राजः) अच्छे प्रकार प्रकाशमान चक्रवर्ती राजजन (यम्) जिसकी (अभि, गृणन्ति) सब ओर से स्तुति करते हैं, उसी की सब निरन्तर स्तुति करें ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! तुम उसी प्रशंसा करने योग्य परमेश्वर की स्तुति करो, जिस की स्तुति करके विदुषी स्त्री राजा और विद्वान् जन चाहा हुआ फल पाते हैं ॥४॥
Subject
फिर मनुष्यों को किसकी प्रशंसा करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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