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Rigveda Mandal 7 / Sukta 37 / Mantra 1

104 Sukta
8 Mantra
7/37/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ वो॒ वाहि॑ष्ठो वहतु स्त॒वध्यै॒ रथो॑ वाजा ऋभुक्षणो॒ अमृ॑क्तः। अ॒भि त्रि॑पृ॒ष्ठैः सव॑नेषु॒ सोमै॒र्मदे॑ सुशिप्रा म॒हभिः॑ पृणध्वम् ॥१॥

आ । वः॒ । वाहि॑ष्ठः । व॒ह॒तु॒ । स्त॒वध्यै॑ । रथः॑ । वा॒जाः॒ । ऋ॒भु॒क्ष॒णः॒ । अमृ॑क्तः । अ॒भि । त्रि॑ऽपृ॒ष्ठैः । सव॑नेषु । सोमैः॑ । मदे॑ । सु॒ऽशि॒प्राः॒ । म॒हऽभिः॑ । पृ॒ण॒ध्व॒म् ॥

Mantra without Swara
आ वो वाहिष्ठो वहतु स्तवध्यै रथो वाजा ऋभुक्षणो अमृक्तः। अभि त्रिपृष्ठैः सवनेषु सोमैर्मदे सुशिप्रा महभिः पृणध्वम् ॥

आ। वः। वाहिष्ठः। वहतु। स्तवध्यै। रथः। वाजाः। ऋभुक्षणः। अमृक्तः। अभि। त्रिऽपृष्ठैः। सवनेषु। सोमैः। मदे। सुऽशिप्राः। महऽभिः। पृणध्वम् ॥१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 4 Varga » 3 Mantra » 1

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Meaning
हे (सुशिप्राः) सुन्दर ठोढ़ी और नासिकावाले (वाजाः) विज्ञानवान् (ऋभुक्षणः) मेधावी बुद्धिमान् ! जो (वः) तुम्हारा (अमृक्तः) न नष्ट हुआ (वाहिष्ठः) अत्यन्त पहुँचानेवाला (रथः) रमण करने योग्य यान (मदे) आनन्द के लिये (त्रिपृष्ठैः) तीन जानने योग्य रूप जिन के विद्यमान उन (महभिः) सत्कार और (सोमैः) ऐश्वर्य्य वा ओषधि आदि पदार्थों से (सवनेषु) उत्तम कामों में (स्तवध्यै) स्तुति करने को हम को सब ओर से पहुँचाता है, वही तुम को (अभि, आ, वहतु) सब ओर पहुँचावे उस को तुम (पृणध्वम्) पूरो, सिद्ध करो ॥१॥
Essence
हे विद्वानो ! तुम हम लोगों को रथ से चाहे हुए स्थान को पहुँचने के समान पढ़ाने से विद्या को पहुँचाओ ॥१॥
Subject
अब सैंतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् जन क्या प्राप्त करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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